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करने में अपना योगदान करना चाहिए यदि वे सदन के किसी भी बड़े वर्ग में विद्यमान हैं। समिति में शामिल किए जाने के बाद मैंने उसकी अनेक बैठकों में भाग लिया था।
यह सच है कि प्रारुप संविधान सभी विषयों के लिए, अथवा उस तरीके से उपबंध नहीं करता जिसे हम अलग-अलग रखना चाहते हैं। उदाहरण के लिए, माननीय सदस्यों ने बताया कि संविधान के अनुसार गौवध मना नहीं है। मूल अधिकार बहुत ज्यादा विशेषित (सीमित) है। राष्ट्रपिता, राष्ट्रीय ध्वज या राष्ट्रगान का कोई उल्लेख नहीं है। हमारे दो माननीय सदस्यों का यह कहना ठीक था कि प्रारुप संविधान में भगवान का भी उल्लेख नहीं है। हमारे सबके अपने-अपने विचार हैंः किन्तु दूसरे संदर्भों में तात्विक रुप से वे कितने भी ठोस या मूल्यवान हों संविधान में उनका समावेश तब तक नहीं किया जा सकता जब तक कि वे उसके प्रयोजन से सम्बद्ध न हों और संविधान द्वारा स्वीकार न किया जाए।
अनेक वक्ता प्रारुप की इस आधार पर आलोचना कर चुके हैं कि इसमें गांधी दर्शन की कोई छाप नहीं है और जबकि कुछ उपबंध भारत शासन अधिनियम, 1935 समेत अनेक विदेशी स्रोतों से उधार लिए गए हैं, उसके कलेवर में प्राचीन भारतीय राज्यतंत्र के तत्वों में से कोई भी नहीं पिरोये गए हैं।
क्या गांधीवादी विचार-धारा वाले हमारे मित्र हमें यह बताएंगे कि क्या वे तार्किक निष्कर्षों में उन विचारों को अपनाएंगे जैसे उदाहरण के लिए, सशस्त्र बलों से युक्त रहकर, विधायी निकायों को हटाकर जिनके काम को गांधी जी ने समय की बरबादी बताया था, हमें ठोस प्राधिकार से बताया गया है कि न्याय प्रणाली समाप्त करके और उसके स्थान पर न्याय करने के सादे और सहज तरीके अपनाकर, इस बात का आग्रह करके किसी भी सरकारी कर्मचारी या सार्वजनिक कार्यकर्ता को प्रति मास कम से कम 500/- रुपए या जो भी सीमा अन्ततः नियत की जाए वेतन नहीं मिलना चाहिए। मैं कुछ कांग्रेसी नेताओं को जानता हूँ जो ईमानदारी से यह मानते हैं कि यह सब किया जाना चाहिए था और किया जा सकता था। किन्तु हम यहाँ उस संविधान की जो बात कर रहे हैं जो पिछली बार संविधान सभा द्वारा तय किया गया था....।
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ख्1, सैय्यद मोहम्मद सादुल्ला (असम-मुस्लिम)ः उपसभापति महोदय, प्रारुपण समिति स्वयं अस्तित्वशील नहीं है। हमें अगस्त, 1947 में इस सदन के संकल्प से बनाया गया था यदि मुझे ठीक से याद है। उस समय मैं स्वयं बीमार पड़ा हुआ था और मैं उस सत्र में भाग नहीं ले सका था। लेकिन श्रीमन, कार्यवाहियों से पता चलता है कि चूंकि प्रारुपण
1 . संविधान सभा वाद-विवाद, शासकीय रिपोर्ट, 7, 9 नवंबर, 1948, पृष्ठ 388 ।