86 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
समिति से उद्देश्य संकल्प की सीमाओं के भीतर संविधान निर्माण करने के लिए कहा गया था इसलिए हमें आलोचनाओं का सामना करना पड़ा जो अब हम सुन चुके हैं। उन दिनों भी बुद्धिमान लोगों ने यह भांप लिया था और मुंबई के विद्वान प्रीमियर श्री खेर ने सरकारी संकल्प का संशोधन पेश किया था जिसमें हमें निर्देश दिया गया था इससे मैं उनके भाषण से पढूँगा। उन्होंने इस प्रारुपण समिति के गठन के लिए मूल संकल्प का संशोधन पेश किया था। उनका कहना था-‘‘प्रारुपण समिति को संविधान सभा में लिए गए विनिश्चयों के अनुसार तथा उन सब विषयों को शामिल करते हुए जो उनके आनुषंगिक हैं या जो ऐसे संविधान में दिए जाने चाहिए। संविधान सलाहकार द्वारा तैयार भारत के संविधान के पाठ के प्रारुप की समीक्षा करने का तथा समिति द्वारा पुनरीक्षित प्रारुप संविधान के पाठ पर विचार के लिए संविधान सभा के समक्ष प्रस्तुत करने का काम सौंपा जाना चाहिए...।
.... यही वह संशोधन था जो सदन द्वारा स्वीकार किया गया था। श्रीमन, माननीय श्री
खेर के इस संशोधन के पश्चात् जो सदन द्वारा स्वीकार किया गया था, अब संविधान सभा के सदस्य यह नहीं कह सकते कि हम अपनी अधिकारिता से कहीं आगे चले गए हैं...।
उपसभापतिः आइए, हम विषय पर बात करें।
सैय्यद मोहम्मद सादुल्लाः मैं माननीय सदस्यों को कैसे बताऊँ कि हमने बड़ा कठोर परिश्रम किया है और अच्छे से अच्छा काम किया है, तथा ऐसा प्रारुप करने के लिए जिसे कोरी काट-छाँट बताया गया है, तीन भिन्न-भिन्न महाद्वीपों से प्राचीन और वर्तमान सभी बात संविधानों को छान डाला है। लेकिन जो लोग कलाप्रिय हैं, जो शिल्प प्रिय हैं, भली प्रकार यह पूर्णतः जानते हैं कि काट-छाँट के काम से भी सुंदर शैलियां, अत्यंत मनोहर डिजाइन बनाए जा सकते हैं। मैं यह दावा कर सकता हूँ कि हमारे प्रारुप में कमियों के बावजूद हमने इस माननीय सदन को यथासंभव पूर्ण तस्वीर देने की कोशिश की है जो इस सदन में चर्चा का आधार बन सके। प्रारुपण समिति ने कभी भी यह दावा नहीं किया कि संविधान पर यह उनका अंतिम शब्द है कि इसके प्रावधान अचूक हैं अथवा यह कि इन अनुच्छेदों को बदला नहीं जा सकता। यह प्रारुप इस महान सदन के सामने आखिरी मंजूरी के लिए पेश किया गया है, यह तथ्य ही इस बात को दर्शाता है कि हम एक या दूसरी नीति से बंधे नहीं हैं। जहां कहीं हमारा समिति की सिफारिशों से मतभेद रहा है अथवा जहां कहीं हमें इस महान सदन के मान्य सिद्धांतों से यहां वहां कोई शब्द बदलने का दुस्साहस किया है, उसका हमने पाद-टिप्पणी में पर्याप्त संकेत दे दिया है ताकि उसमें कुछ भी गुप्त रुप से प्रवेश न करे। सदन का ध्यान इसलिए खींचा गया है ताकि उन मुद्दों पर सदस्यों के विचार केन्द्रित हो सकें जिनमें प्रारुपण समिति ने सोचा कि वे पहले से स्वीकृत सिद्धांतों से या समिति की सिफारिशों से हटकर चलें।