अनुच्छेद - Page 110

91

अनच्छेद-1

3. भारत का वर्णनः प्रारुप के अनुच्छेद-1 में भारत का वर्णन राज्यों के संघ के रुप में किया गया है। एकरुपता की खातिर समिति ने यह वांछनीय समझा कि नये संविधान में संघ की इकाइयों को राज्य कहा जाए चाहे वे फिलहाल गवर्नर के प्रांत के रुप में ज्ञात हों या मुख्य आयुक्त के प्रांत या देशी रियासतों के नाम से। नये संविधान में भी निःसंदेह इकाइयों में कुछ अंतर रहेगा_ और इस अंतर को बताने के लिए समिति ने राज्यों को तीन वर्गों में बांटा है- ‘प्रथम अनुसूची के भाग 1 में अंकित राज्य, भाग 2 में अंकित राज्य और भाग 3 में अंकित राज्य। ये क्रमशः वर्तमान गवर्नर के प्रांत, मुख्य आयुक्त के प्रांत और देशी रियासतों के तत्स्थानी हैं।

यह देखा जाएगा कि समिति ने परिसंघ के बजाय ‘संघ’ शब्द का प्रयोग किया है। नाम से ज्यादा फर्क नहीं पड़ता लेकिन समिति ने ब्रिटिश नॉर्थ अमेरिका एक्ट, 1867 की उद्देशिका की भाषा को अपनाना अधिक पसंद किया, और सोचा कि भारत को संघ कहना लाभप्रद है भले ही उसका संवैधानिक ढांचा परिसंघीय हो।

अनुच्छेद 5 और 6 4. नागरिकताः समिति ने संघ की नागरिकता के प्रश्न पर उत्सुकता से लम्बे समय तक विचार किया है। समिति ने यह आवश्यक समझा कि शुरु में संघ का नागरिक होने के लिए व्यक्ति का संघ से किसी प्रकार का क्षेत्रीय संबंध अवश्य होना चाहिए चाहे वह जन्म से हो, या वंश से या निवास स्थान से हो। समिति को संदेह है कि क्या उन लोगों को नागरिक मानना बुद्धिमानी होगी जो भारत के राज्यक्षेत्र में ऐसे किसी संबंध के बिना संघ के प्रति राज्य-निष्ठा की शपथ लेने के लिए तैयार रहें_ क्योंकि यदि अन्य राज्य ऐसे उपबंध की नकल करने लगे तो संघ के भीतर बहुत बड़ी संख्या में ऐसे लोग मिल सकते हैं जो हालांकि इसमें पैदा हुए हैं और निवास करते हैं फिर भी किसी दूसरे देश के प्रति राज्यनिष्ठा की शपथ ले लेंगे। फिर भी समिति ने बहुत बड़ी संख्या में उन विस्थापित लोगों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखा है जिन्हें हाल के महीनों में भारत प्रवास करना पड़ा है, और समिति ने उनके लिए अधिवास हासिल करने और उससे नागरिकता हासिल करने के लिए विशेष तौर पर आसान ढंग की व्यवस्था की है।