93
सातवीं अनुसूची में समवर्ती विधायी सूची के भाग 1 और 2 के अनुसार प्रारुप संविधान में समिति ने इस योजना से हल्का सा विचलन किया है और यह उपबंध किया है कि ‘‘इस संविधान में या संसद द्वारा बनाई गई किसी अन्य विधि में अभिव्यक्त रुप से यथा उपबंधित के सिवाय, ‘‘कार्यपालक शक्ति प्रांत में अब राज्य कहलाता है के निहित होगी। इस छोड़े हुए खंड का परिणाम यह है कि नये संविधान के अनुसार संघ संसद कार्यपालिका शक्ति संघ के प्राधिकारियों को प्रदत्त कर सकेगी, अथवा, यदि आवश्यक हो तो, संघ के प्राधिकारियों को यह निर्देश देने के लिए सशक्त कर सकेगी कि राज्य के प्राधिकारी कार्यपालिका शक्ति का प्रयोग कैसे करें। यह उपबंध करते समय समिति ने इस सिद्धांत को ध्यान में रखा है कि कार्यपालिका प्राधिकार अधि कांशतः विधायक शक्ति के साथ-साथ चलना चाहिए।
अनुच्छेद 67 8. राज्यसभा की संरचनाः संविधान सभा द्वारा किए गए विनिश्चय के अनुसार राज्यसभा में ज्यादा से ज्यादा 25 सदस्य (अधिकतम 250) में से ऐसे होंगे जो कार्य के आधार पर पैनलों या निर्वाचन-क्षेत्रों से चुने जाएंगे। चूंकि पैनल प्रणाली अब तक उस देश में असंतोषजनक सिद्ध हो चुकी है जिससे इसकी नकल की गई थी आयरलैंड इसलिए समिति ने यह उपबंध करना सबसे उत्तम समझा कि 15 सदस्य साहित्य, कला, विज्ञान आदि में विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव के कारण राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत किए जाएंगे। समिति का मानना है कि इस मनोनयन में श्रम या वाणिज्य और उद्योग के लिए विशेष प्रतिनिधि रखना आवश्यक नहीं है क्योंकि प्रौढ़ मताधिकार के फलस्वरुप संसद के निर्वाचित सदस्यों में उनका पर्याप्त प्रतिनिधित्व होना निश्चित है।
अनुच्छेद 63 और 151 9. संघ संसद और राज्य विधानमंडलों का कार्यकालः समिति समझती है कि संसदीय प्रणाली के अंतर्गत, विशेषकर प्रौढ़ मताधिकार के आधार पर नये संविधान के प्रारंभ में चार वर्ष से अधिक कार्यकाल वांछनीय है। नये मंत्रियों को प्रशासन की बारीकियों की जानकारी हासिल करने के लिए समय चाहिए। उनके मद का अंतिम वर्ष तो अगले आम चुनावों की तैयारी में लग जाता है। चार वर्ष के कार्यकाल से उन्हें किसी प्रकार के सुनियोजित प्रशासन के लिए पर्याप्त समय नहीं मिल पाएगा।