अनुच्छेद - Page 114

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(2) इनमें से प्रत्येक प्रांत का प्रशासन सामान्यतया विधानमंडल के प्रति उत्तरदायी मंत्री परिषद द्वारा किया जाना चाहिए।

(3) इनमें से प्रत्येक प्रांत में एक निर्वाचित विधानमंडल होना चाहिए।

जहां तक पंथ पिपलोदा का संबंध है, समिति की सिफारिश थी कि उसे अजमेर, मारवाड़ में मिला दिया जाए और जहां तक अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह का संबंध है, समिति की सिफारिश थी कि उनका प्रशासन उस समय की विद्यमान भारत सरकार, ऐसे उपांतर करके करे जैसे आवश्यक समझे जाएं_ दूसरे शब्दों में, ये द्वीपसमूह मुख्य आयुक्त के प्रांत के रुप में ही बने रहने थे। इस समिति में अजमेर, मारवाड़ तथा कुर्ग के प्रतिनिधियों ने समिति की रिपोर्ट में एक टिप्पणी लगाई जिसमें उन्होंने कहा कि चूंकि ये क्षेत्र छोटे-मोटे हैं, इनकी भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि इनमें संसाधनों की कमी है इसलिए इनकी विशेष समस्याओं के फलस्वरुप सुदूर भविष्य में प्रत्येक क्षेत्र को एक निकटवर्ती इकाई में शामिल होना पड़ेगा। अतः उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि संबंधित लोगों की इच्छाओं का पता लगाने के बाद इसे संभव बनाने के लिए संविधान में एक खास उपबंध होना चाहिए।

जहां तक दिल्ली का संबंध है, समिति को लगता है कि भारत की राजधानी होने के नाते इसे स्थानीय प्रशासन में नहीं रखा जा सकता है। संयुक्त राज्य अमेरिका में कांग्रेस शासन-स्थल की बाबत अनन्य विधायी शक्ति का इस्तेमाल करती है_ आस्ट्रेलिया में भी ऐसा ही है। इसलिए प्रारुपण समिति इस निष्कर्ष पर पहुंची है कि तदर्थ समिति की सिफारिश की अपेक्षा एक वृहद् योजना होनी चाहिए। तदनुसार प्रारुपण समिति ने प्रस्ताव रखा है कि इन केन्द्र-शासित क्षेत्रों का प्रशासन भारत सरकार, मुख्य आयुक्त या उपराज्यपाल के माध्यम से या पड़ोसी राज्य के राज्यपाल अथवा शासक के माध्यम से किया जाए। किसी क्षेत्र विशेष के बारे में क्या किया जाए यह राष्ट्रपति पर छोड़ दिया जाए कि वह जैसा चाहे आदेश द्वारा निर्धारित करें_ निःसंदेह, अन्य विषयों की भांति इसमें भी वह जिम्मेदार मंत्रियों की सलाह पर काम करेगा। यदि ऐसी सलाह दी जाए तो वह दिल्ली में उपराज्यपाल रख सकता