112 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
(ख) उन कृत्यों के लिए दंड विहित करने के लिए, जो इस
भाग के अंतर्गत अपराध घोषित हैं, विधि बनाये और
संसद इस संविधान के प्रारंभ के पश्चात् यथाशीघ्र ऐसे
विषयों के उपबंध करने के लिए और ऐसे कार्यों के लिए
दंड विहित करने के लिए विधियां बनाएगी_ परंतु इस
अनुच्छेद के खंड (क) में निर्दिष्ट विषयों में से किसी
की बाबत अथवा किसी कार्य के लिए दंड के लिए
उपबंध करने के लिए, जो इस भाग के अधीन अपराध
घोषित है, भारत के राज्यक्षेत्र में या उसके किसी भाग में
प्रवृत्त कोई विधि उसमें तब तक प्रवृत्त रहेगी जब तक
संसद द्वारा या अन्य सक्षम प्राधिकरण द्वारा परिवर्तन,
निरसन या संशोधन न कर दिया जाए।
भाग 4
राज्य की नीति के निदेशक तत्व
परिभाषा 28. इस भाग में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न
हो, ‘‘राज्य का वही अर्थ है जो भाग 3 में है।
इस भाग में 29. इस भाग में अंतर्विष्ट उपबंध किसी न्यायालय द्वारा अंतर्विष्ट तत्चों प्रवर्तनीय नहीं होंगे किन्तु फिर भी इनमें अधिकथित तत्व का लागू होना देश के शासन में मूलभूत हैं और विधि बनाने में इन तत्वों
को लागू करना राज्य का कर्तव्य होगा।
राज्य लोक 30. राज्य ऐसी सामाजिक व्यवस्था की, जिसमें सामाजिक, कल्याण की आर्थिक और राजनैतिक न्याय राष्ट्रीय जीवन की सभी अधिवृद्धि के संस्थाओं को अनुप्रमाणित करे, भरसक प्रभावी रुप में लिए सामाजिक स्थापना और संरक्षण करके लोक कल्याण की अभिवृद्धि व्यवस्था बनायेगा प्रयत्न करेगा।
राज्य द्वारा 31. राज्य अपनी नीति का विशिष्टतया, इस प्रकार संचालन अनुसरणीय करेगा कि सुनिश्चित रुप से-
कुछ नीति तत्व (i) पुरुष और स्त्री सभी नागरिकों को समान रुप से जीविका
के पर्याप्त साधन प्राप्त करने का अधिकार हो_
(ii) समुदाय की भौतिक सम्पदा का स्वामित्व और नियंत्रण
इस प्रकार बंटा हो जिससे सामूहिक हित का सर्वोत्तम
रुप से साधन हो_