अध्याय-4 - संघ की न्यायपालिका - Page 173

154 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

(ख) एक ओर भारत सरकार और किसी राज्य या राज्यों और

दूसरी ओर एक या अधिक अन्य राज्यों के बीच, या

(ग) दो या अधिक राज्यों के बीच,

किसी विवाद में, यदि और जहां तक उस विवाद में विधि

का या तथ्य का ऐसा कोई प्रश्न अंतर्वलित है जिस पर

किसी विधिक अधिकार का अस्तित्व या विस्तार निर्भर

है तो और वहां तक अन्य न्यायालयों का अपवर्जन करके

उच्चतम न्यायालय को आरंभिक अधिकारिता होगीः

परंतु उक्त अधिकारिता का विस्तारः

(क) उस विवाद पर नहीं होगा जिसमें पहली अनुसूची के

भाग 3 में तत्समय विनिर्दिष्ट राज्य पक्षकार है, यदि वह

विवाद की संधि करार, वचनबंध, सनद या वैसी ही अन्य

लिखित से उत्पन्न हुआ है जो इस संविधान के प्रारंभ से

पहले की गयी थी या निष्पादित की गई थी और उस

तारीख के पश्चात् प्रवर्तन में है या प्रवर्तन में बनी हुई है,

(ख) उस विवाद पर नहीं होगा जिसमें कोई राज्य पक्षकार है,

यदि विवाद किसी संधि, करार, वचनबद्ध, सनद या अन्य

वैसी लिखत के किसी उपबंध से उत्पन्न हुआ है जिसमें

उपबंधित है कि उक्त अधिकारिता का विस्तार ऐसा

विवाद पर नहीं होगा।

कुछ मामलों 110. (1) किसी राज्य में किसी उच्च न्यायालय की सिविल, में राज्यों में उच्च दांडिक या अन्य कार्यवाही में दिए गए किसी निर्णय, न्यायालयों से डिक्री या अंतिम आदेश की अपील उच्चतम न्यायालय अपीलों में उच्चतम में होगी यदि वह न्यायालय प्रमाणित कर देता है कि उस न्यायालय की मामले में इस संविधान के निर्वाचन के बारे में विधि का अपीली अधिकारिता कोई सारवान प्रश्न अंतर्वलित है।

(2) जहां उच्च न्यायालय ने ऐसा प्रमाण-पत्र देना अस्वीकार

कर दिया हो वहां यदि उच्चतम न्यायालय का समाधान

हो जाए कि उस मामले में इस संविधान के निर्वाचन का

सारवान विधि-प्रश्न अंतर्ग्रस्त है तो, वह ऐसे निर्णय,

डिक्री या अंतिम आदेश की अपील के लिए विशेष

इजाजत दे सकेगा।