158 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
उच्चतम न्यायालय 118. (1) उच्चतम न्यायालय अपनी अधिकारिता का प्रयोग करते की डिक्रियों और हुए ऐसी डिक्री पारित कर सकेगा या ऐसा आदेश जो आदेशों का प्रवर्तन उसके समक्ष लंबित किसी वाद या विषय में पूर्ण न्याय और प्रकटीकरण करने के लिए आवश्यक हो और इस प्रकार पारित डिक्री आदि के बारे या किया गया आदेश भारत के राज्यक्षेत्र में सर्वत्र ऐसी में आदेश रीति से, जो संसद द्वारा बनाई गई किसी विधि द्वारा या
उसके अधीन विहित की जाए और जब तक इस निमित्त
इस प्रकार उपबंध नहीं किया जाता है तब तक ऐसी रीति
से जो राष्ट्रपति आदेश द्वारा विहित करे, प्रवर्तनीय होगा।
(2) संसद द्वारा इस निमित्त बनाई गई किसी विधि के उपबंधों
के अधीन रहते हुए, उच्चतम न्यायालय को भारत के
संपूर्ण राज्यक्षेत्र के बारे में किसी व्यक्ति को हाजिर कराने
के, किन्ही दस्तावेजों के प्रकटीकरण या पेश कराने के
अथवा अपने किसी अवमानना का अन्वेषण करने या दंड
देने के प्रयोजन के लिए कोई आदेश करने की समस्त
और प्रत्येक शक्ति होगी।
उच्चतम न्यायालय 119. (1) यदि किसी समय राष्ट्रपति को प्रतीत होता है कि विधि से परामर्श करने या तथ्य का कोई ऐसा प्रश्न उत्पन्न हुआ है या उत्पन्न की राष्ट्रपति की होने की संभावना है, जो ऐसी प्रकृति का है और ऐसे शक्ति व्यापक महत्व का है कि उस पर उच्चतम न्यायालय की
राय प्राप्त करना समीचीन है तो वह उस प्रश्न को विचार
करने के लिए उच्चतम न्यायालय को निर्देशित कर सकेगा
और वह न्यायालय, ऐसी सुनवाई के पश्चात् जो वह
ठीक समझता है, राष्ट्रपति को उस पर अपनी राय
प्रतिवेदित कर सकेगा।
(2) राष्ट्रपति, इस संविधान के अनुच्छेद 109 के परंतुक के
खंड (1) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, उक्त
खंड में वर्णित प्रकार का विवाद, विनिश्चय करने के
लिए उच्चतम न्यायालय को निर्देशित कर सकेगा और
उच्चतम न्यायालय उस पर पक्षकारों को सुने जाने का
अवसर प्रदान करने के बाद, उस पर विनिश्चय करेगा
और तथ्य राष्ट्रपति को प्रतिवेदित करेगा।