अध्याय 7 - राज्यों के उच्च न्यायालय - Page 227

208 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

(घ) किन्ही ऐसे न्यायालयों के अधिकारियों द्वारा रखी जाने

वाली पुस्तकों, प्रविष्टियों और लेखाओं के प्रारुप विहित

कर सकेगा।

(3) उच्च न्यायालय उन फीसों की सारणियां भी स्थिर कर

सकेगा जो ऐसे न्यायालयों के शैरिफ को तथा सभी

लिपिकों और अधिकारियों को तथा उनमें विधि-व्यवसाय

करने वाले अटर्नियों, अधिवक्ताओं और प्लीडरों को

अनुज्ञेय होगीः

परंतु खंड (2) या खंड (3) के अधीन बनाए गए कोई

नियम, विहित किए गए कोई प्रारुप या स्थिर की गई

कोई सारणी तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के उपबंध से

असंगत नहीं होगी और इसके लिए राज्यपाल के पूर्व

अनुमोदन की अपेक्षा होगी।

कुछ मामलों का 204. यदि उच्च न्यायालय का समाधान हो जाता है कि उसके उच्च न्यायालय अधीनस्थ किसी न्यायालय में लंबित किसी मामले में इस को विवरण के संविधान के निर्वचन के बारे में विधि का कोई सारवान लिए अंतरण प्रश्न अन्तर्वलित है तो वह उसे अपने पास मंगवा सकेगा

और उसका निपटारा कर सकेगा।

स्पष्टीकरण- इस अनुच्छेद में, उच्च न्यायालय के

अंतर्गत इस प्रकार लंबित मामले के संबंध में पहली

अनुसूची के भाग 3 में तत्समय विनिर्दिष्ट किसी राज्य में

अंतिम अधिकारिता का न्यायालय भी है। उच्च न्यायालयों 205. (1) किसी उच्च न्यायालय के अधिकारियों और सेवकों को के अधिकारियों या के संबंध में संदेय वेतन, भत्ते और पेंशन उस तथा सेवकों के न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति द्वारा उस राज्य के राज्यपाल वेतन, भत्ते और से परामर्श करके जिसमें उस उच्च न्यायालय की प्रधान पेंशन तथा व्यय पीठ है, नियत किए जाएंगे।

(2) उच्च न्यायालय के अधिकारियों और सेवकों को या के

संबंध में संदेय समस्त वेतन, भत्ते और पेंशन सहित उस

न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन और भत्ते राज्य के

राजस्व पर भारित होंगे, और न्यायालय द्वारा ली गई कोई

फीस या अन्य धन उप राजस्वों का अंग होंगे।