1. लक्ष्य और उद्देश्य संबंधी संकल्प - Page 24

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मानवाधिकारों की घोषणा और वे सिद्धांत जो उसमें अंकित हैं, हमारी मानसिकता के अभिन्न अंग बन गये हैं। मेरा कहना यह है कि ये न केवल विश्व के किसी सभ्य भू-भाग में आधुनिक मनुष्य की मानसिकता के अभिन्न बन गए है बल्कि हमारे अपने देश में जो कि विचारों में और सामाजिक ढांचे में इतना पुरातनपंथी है, इनकी यही स्थिति है। ऐसे हालात में शायद ही ऐसा कोई होगा, जो उनकी विधिमान्यता से इनकार करे। अब उसे दोहराना, जैसा कि संकल्प कहता है, निश्चय ही कोरा पांडित्यदर्प होगा। ये सिद्धांत हमारे दृष्टिकोण के मौन विशुद्व पक्ष बन गये है। अतः यह घोषणा करना अनावश्यक है कि ये हमारे पन्थ के अंग हैं। संकल्प में कुछ और भी कमियां हैं। मैं देखता हूँ कि यद्यपि संकल्प के इस भाग में कुछ अधिकार अंकित किये गये हैं पर इसमें उपचारों का कोई जिक्र नहीं है। इस सभी इस बात को जानते हैं कि उपचारों के बिना अधिकार निरर्थक हैं। उपचारों के द्वारा ही, लोग अधिकारों को अतिक्रमण होने पर निवारण करने की मांग कर सकते हैं। मैं देखता हूँ कि इसमें उपचारों का पूर्ण अभाव है। इस संकल्प में यह सामान्य सूत्र भी समाविष्ट नहीं है कि किसी आदमी के प्राण, स्वाधीनता और सम्पत्ति विधि की सम्यक प्रक्रिया के बिना नहीं लिये जाएंगे। ये वर्णित मूल अधि कार विधि और नैतिकता के अधीन रखे गये हैं। प्रकट है कि विधि क्या है, नैतिकता क्या है, यह समकालीन कार्यपालिका द्वारा तय किया जाएगा। और एक कार्यपालिका कोई एक मत अपनाए तो हो सकता है दूसरी कार्यपालिका कोई दूसरा मत अपनाए। हमें नहीं पता कि यदि इस विषय को समकालीन कार्यपालिका पर छोड़ दिया जाए तो मूल अधिकारों के संबंध में निश्चत रुप से क्या स्थिति होगी। महोदय, इसमें कुछ उपबंध ऐसे हैं जो आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक न्याय की बात करते हैं। यदि इस संकल्प के पीछे कोई वास्तविकता और ईमानदारी है जिसमें मुझे लेशमात्र भी शक नहीं है तो जिस रुप में यह संकल्प प्रस्तुतकर्ता की ओर से आया है मैं इसमें कुछ उपबंधों की प्रत्याशा करता हूँ जिसके द्वारा राज्य के लिए आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक न्याय को साकार रुप देना संभव होता। साथ ही मैं यह प्रत्याशा करता कि संकल्प में स्पष्ट रुप से यह अंकित किया जाना चाहिए था कि देश में सामाजिक-आर्थिक न्याय होगा तथा उद्योगों और जमीन का राष्ट्रीयकरण होगा। मेरी समझ में नहीं आता कि किसी भी भावी सरकार के लिए जो सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय में विश्वास करती है, यह कैसे संभव हो सकता है जब तक कि उसकी अर्थव्यवस्था समाजवादी अर्थव्यवस्था न हो। अतः व्यक्तिगत रुप से, मुझे इन सिद्धांतों पर कोई आपत्ति नहीं है, फिर भी यह संकल्प मेरे विचार में, कुछ निराशाजनक है। बहरहाल, मैं इस विषय को अपनी उपरोक्त मताभिव्यक्तियों के साथ वहीं छोड़ने के लिए तैयार हूँ जहां यह है।

अब मैं संकल्प के प्रथम भाग पर आता हूँ। इसके अंतर्गत पहले चार परिच्छेद है।