1. लक्ष्य और उद्देश्य संबंधी संकल्प - Page 25

6 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

जैसा कि मैने कहा था, सदन में हुई चर्चा से यह संविवाद का विषय बन गया है। संविवाद ‘‘गणराज्य’’ शब्द के इस्तेमाल पर केन्द्रित प्रतीत होता है। यह पैरा 4 में आये इस वाक्य पर केन्द्रित है- ‘‘संप्रभुता लोगों में निहित है।’’ ‘‘मेरे मित्र डॉ. जयकर ने कल जो मुद्दा उठाया था उससे यह निष्कर्ष निकलता है कि मुस्लिम लीग की अनुपस्थिति में इस संकल्प पर आगे बढ़ना उचित नहीं होगा। महोदय, अब मुझे इस महान देश के सामाजिक? राजनीतिक और आर्थिक ढांचे के भावी विकास तथा अंतिम आकृति के बारे में लेशमात्र भी संदेह नहीं है। मैं जानता हूँ कि आज हम राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से विभाजित हैं। हम लड़ाकू शिविरों का एक समूह हैं और मैं तो यह भी मानने को तैयार हूँ कि मैं ऐसे शिविर के नेताओं में से एक हूँ। लेकिन, श्रीमान्, इसके बावजूद मैं पूरी तरह से आश्वस्त हूँ कि समय और परिस्थितियां अनुकूल हों तो दुनिया में कोई भी इस देश को एक होने से नहीं रोक पाएगा (हर्ष ध्वनि)ः विभिन्न जातियों और धर्मों के होते हुए भी, मुझे इसमें लेशमात्र भी संकोच नहीं है कि हम किसी न किसी रुप में ‘‘एकजुट लोग‘‘ होंगे (तालियां) मैं निःसंकोच यह कह सकता हूँ कि भारत के विभाजन के लिए मुस्लिम लीग के आंदोलन के बावजूद एक दिन स्वयं मुसलमानों में पर्याप्त जागृति आएगी और वे भी यह सोचने लगेंगे कि अखंड भारत उनके लिए भी बेहतर है’’ (जोरदार तालियां और हर्ष ध्वनि)।

जहां तक अंतिम लक्ष्य का संबंध है हममें से किसी को भी भयभीत होने की जरुरत नहीं है। मुश्किल अंतिम भविष्य के बारे में नहीं है। हमारी मुश्किल यह है कि आज हमारा जनसमूह जो बिखरा पड़ा है वह मिलजुलकर फैसला करे और एकता का मार्ग प्रशस्त करे। हमारी मुश्किल अंतिम के बाबत नहीं है, हमारी मुश्किल है शुरुआत की। इसलिए, सभापति जी, बहुसंख्यक पार्टी को बेहतर शासन कला का प्रदर्शन करते हुए इच्छुक लोगों को दोस्त बनाने व इस देश की हर पार्टी, हर वर्ग को उस मार्ग पर ले जाने की दृष्टि से, उन लोगों के पूर्वाग्रहों को रियायत देनी चाहिए थी जो साथ-साथ चलने को तैयार नहीं हैं। महान राजनेता का यही काम होना चाहिए और उसी की खातिर मैं यह अपील करना चाहता हूँ। आइए, नारों को भुला दें, लोगों को डराने वाले शब्दों को छोड़ दें, अपने विरोधियों के पूर्वाग्रहों को भी रियायत दे दें, उन्हें साथ लेकर चलें ताकि वे अपनी इच्छा से हमारे साथ उस मार्ग पर आगे बढ़ चलें। जैसा कि मैंने कहा था, यदि हम काफी दूर तक साथ चलें तो वह मार्ग अवश्य ही हमें एकता की मंजिल तक ले जाएगा। इसलिए अगर मैं इस जगह से डॉ. जयकर के संशोधन का समर्थन करता हूँ तो वह इसलिए कि मैं चाहता हूँ कि हम सब यह समझें कि हम सही हैं या गलत। जो स्थिति हम ले रहे हैं वह हमारे कानूनी अधिकारों के अनुरुप है या नहीं और क्या वह 16 मई और 6 दिसम्बर के वक्तव्य का समर्थन करती है, उन सब को एक तरफ छोड़ दें। यह इतना बड़ा सवाल है कि उसे कानूनी अधिकारों का विषय नहीं माना