अध्याय 1 - विधायी संबंध, विधयी शक्तियों का वितरण - Page 241

* अनुच्छेद 226 228. इस संविधान के अनुच्छेद 226 और 227 में कोई बात और 227 के राज्य के विधानमंडल की कोई विधि बनाने की शास्ति अधीन संसद द्वारा को, जिसे बनाने की शक्ति उसे इस संविधान के अधीन बनाई गई विधियों है, निर्बन्धित नहीं करेगी, किन्तु यदि राज्य के विधान और राज्यों के मंडल द्वारा बनाई गई किसी विधि का कोई उपबंध संसद विधानमंडलों द्वारा द्वारा बनाई गई विधि, चाहे वह राज्य के विधानमंडल बनाई गई विधिया ं द्वारा बनाई गई विधि से पहले या उसके बाद में पारित की

गई हो अभिभावी रहेगी और राज्य के विधानमंडल द्वारा

बनाई गई विधि, इस विरोध की मात्रा तक, किन्तु तब तक

ही जब तक संसद द्वारा बनायी गई विधि प्रभावी बनी

रहती है, प्रवर्तनशील नहीं होगी।

दो या अधिक 229. (1) यदि किन्हीं दो या अधिक राज्यों के विधानमंडलों को यह राज्यों के लिए वांछनीय प्रतीत होता है कि उन विषयों में से, जिनके उनकी सहमति संबंध में संसद को अनुच्छेद 226 और अनुच्छेद 227 में से विधि बनाने यथा उपबंधित के सिवाय राज्यों के लिए विधि बनाने की की संसद की शक्ति नहीं है, किसी विषय का विनियमन ऐसे राज्यों में शक्ति और संसद विधि द्वारा करे और यदि उन राज्यों के विधानमंडलों ऐसी विधि का के सभी सदन उस आशय के संकल्प पारित करते हैं तो किसी अन्य उस विषय का तदनुसार विनियमन करने के लिए कोई राज्य द्वारा अधिनियम पारित करना संसद के लिए विधिपूर्ण होगा अंगीकार किया और इस प्रकार पारित अधिनियम ऐसे राज्यों को लागू जाना होगा और ऐसे अन्य राज्य को लागू होगा, जो तत्पश्चात्

अपने विधानमंडल के सदन या जहां दो सदन हैं वहां

दोनों सदनों में से प्रत्येक सदन इस निमित्त पारित संकल्प

द्वारा उसको अंगीकार कर लेता है।

* . समिति बहुमत से यह फैसला करती है कि यदि संसद राज्य सूची के किसी ऐसे विषय पर कानून

बनाती है जो राष्ट्रहित में हो तो उसे समवर्ती सूची का विषय माना जाए परंतु श्री अल्लादी कृष्णास्वामी

अय्यर ऐसी किसी अवधारणा के हित में नहीं है। उनका मानना है कि इसके द्वारा संघ धीरे-धीरे राज्यों

के क्षेत्राधिकारों का हनन कर सकता है और जो कि संविधान के संघीय ढांचे पर एक प्रहार है।