8 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
करने के लिए अपनी सहमति दे दी है, वह केन्द्र जो इस देश में 150 वर्ष के प्रशासन के फलस्वरुप बन गया था और जिसके लिए मुझे कहना होगा कि यह अत्यंत प्रशंसा, आदर और आश्रय की बात थी। लेकिन चूंकि वह स्थिति छोड़ दी गई है और यह कहा गया है कि हम एक मजबूत केन्द्र नहीं चाहते, और यह स्वीकार किया जा चुका है कि एक मध्यवर्ती निकाय-‘सघ सरकार और प्रांतों के बीच उप परिसंघ अवश्य होना चाहिए। मैं यह जानना चाहूँगा कि पैरा 3 में समूहकरण के विचार का उल्लेख क्यों नहीं है? मैं अच्छी तरह समझता हूँ कि कांग्रेस पार्टी, मुस्लिम लीग और महामहिम की सरकार समूहकरण विधायक खण्ड के निर्वाचन पर एकमत नहीं है। यदि यह साबित कर दिया जाए कि मैं गलत हूँ तो मैं सुधार के लिए तैयार रहता हूँ-कम से कम कांग्रेस पार्टी इस बात से सहमत थी कि यदि वे प्रांत जो विभिन्न समूहों में रखे गए हैं, संघ या उप परिसंघ बनाने के लिए सहमत हैं तो कांग्रेस को उस प्रस्ताव पर कोई आपत्ति नहीं होगी। मुझे विश्वास है कि मैंने कांग्रेस पार्टी के मन की बात ठीक से जान ली है। मेरा सवाल यह है कि इस संकल्प के प्रस्तुतकर्ता ने प्रांतों के संघ या प्रांतों के समूह उन शर्तों पर बनाने के विचार का हवाला क्यों नहीं दिया, जिन पर वह और उनकी पार्टी उसे स्वीकार करने के लिए तैयार थी? संघ के विचार को इस संकल्प से पूरी तरह क्यों मिटा दिया गया? मुझे इसका कोई जवाब नहीं मिलता। कोई भी नहीं। इसलिए उन दो सवालों के जवाब में जो यहां इस सभा में बिहार के प्रधानमंत्री और डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने उठाये हैं कि यह संकल्प 16 मई के वक्तव्य से असंगत कैसे है या यह संकल्प मुस्लिम लीग को संविधान सभा में आने से कैसे रोकता है, मेरा यह कहना है कि यह पैरा 3 है जिसका फायदा उठाने और अपनी निरन्तर अनुपस्थिति को न्यायोचित ठहराने के लिए मुस्लिम लीग आबद्ध है। श्रीमान्, कल मेरे मित्र डॉ. जयकर ने इस मुद्दे पर फैसला स्थगित करने की बहस करते समय अपना पक्ष किसी कानूनी पंडित की भांति प्रस्तुत किया था-यदि उनके प्रति बिना किसी अनादर भाव के, मुझे ऐसा कहने की अनुमति हो तो उनके तर्क का आधार था- क्या आपको ऐसा करने का अधिकार है? उन्होंने कैबिनेट मिशन के वक्तव्य में से कुछ अंश पढ़े, पढ़कर सुनाए जो संविधान सभा के प्रक्रियात्मक भाग से संबंधित थे। उनकी दलील थी कि इस संकल्प पर फैसला करने के लिए संविधान सभा ने जो सीधे प्रक्रिया अपना ली है वह उस प्रक्रिया से अलग हटकर है जो पेपर में दी गई थी। श्रीमान्, मैं इस विषय को कुछ भिन्न तरीके से रखना चाहता हूँ। मैं आपसे इस बात पर विचार करने के लिए नहीं कह रहा हूँ कि आपको इस संकल्प को सीधे पारित करने का अधिकार प्राप्त है अथवा नहीं। हो सकता है, आपको ऐसा करने का अधिकार हो। मेरा सवाल यह है कि क्या ऐसा करना आपके लिए प्रज्ञापूर्ण होगा? क्या ऐसा करना आपके लिए बुद्धिमत्तापूर्ण होगा? सत्ता एक अलग बात है, विवेक बिलकुल भिन्न चीज है और मैं चाहता हूँ कि सदन इस पर इस दृष्टिकोण से विचार करे कि