1. लक्ष्य और उद्देश्य संबंधी संकल्प - Page 29

10 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

सुलह’’ पर बुरके के महान भाषण में से एक अंश पढ़ना चाहता हूँ। मैं मानता हूँ कि उसका इस सदन की मनःस्थिति पर कुछ असर पड़ सकता है। जैसा कि आप जानते हैं, ब्रिटिश लोग संयुक्त राज्य अमेरिका के विद्रोही उपनिवेशों को जीतने की और उन्हें उनकी इच्छा के खिलाफ अपने अधीन करने की कोशिश कर रहे थे। उन निवेशों को जीतने के इस ख्याल का खंडन करते हुए बुरके ने कहा थाः-

‘‘सबसे पहले, श्रीमान्, मुझे यह व्यक्त करने की अनुमति दें कि बल का प्रयोग केवल अस्थायी होता है। क्षणभर के लिए वश में किया जा सकता है किन्तु इससे पुनः वश में करने की आवश्यकता तो समाप्त नहीं होती है और ऐसे राष्ट्र पर शासन नहीं किया जाता जिसे निरन्तर जीतना होता है। मेरी अगली आपत्ति है उसकी अनिश्चितता। आतंक हमेशा बल का परिणाम नहीं होता है और शस्त्र में सज्जा विजय नहीं होती। यदि सफल नहीं होते हैं। तो आप संसाधानहीन है क्योंकि सुलह के नाकाम होने पर तो ताकत रहती है, किन्तु ताकत के नाकाम होने पर आगे सुलह की कोई आशा नहीं रहती। शक्ति और प्राधिकार कभी-कभी सज्जनता से तो खरीद लिए जाते हैं लेकिन उन्हें कंगाल बना दी गई या विफल हिंसा द्वारा भीख के रुप में कभी नहीं मांगा जा सकता.......

‘‘बल प्रयोग पर एक और आपत्ति है कि आप उद्देश्य को परिरक्षित करने के अपने यत्नों से ही उसे क्षीण कर देते हैं। जिस चीज के लिए आपने लड़ाई लड़ी थी वह चीज नहीं है जो आप प्राप्त करते हैं, वह तो लड़ाई में घिस-पिट गई, और मर-खप गई।’’

ये बहुत मूल्यवान शब्द हैं। इनकी अवहेलना करना खतरनाक होगा। क्या कोई ऐसा आदमी है जिसके मन में हिन्दू-मुस्लिम समस्या को ताकत से सुलझाने की योजना हो-जो युद्ध से सुलझाने का ही दूसरा नाम है। मुसलमानों को अपने अधीन करके ऐसे संविधान को मानने के लिए झुकाया जा सके, इसके लिए इस देश को उन्हें हमेशा जीतने में लगे रहना होगा। यह एक बार की विजय सदा-सदा के लिए नहीं होगी। मैं और अधिक समय नहीं लेना चाहता हूँ। मैं पुनः बुरके का हवाला देकर अपनी बात समाप्त करुंगा। बुरके ने कहीं कहा है कि शक्ति देना आसान है लेकिन विवेक देना मुश्किल है। आइए, हम अपने आचरण से यह साबित कर दें कि यदि इस सभा ने अपने आपको संप्रभु शक्तियां प्रदान कर दी हैं तो वह उनका प्रयोग विवेकपूर्ण ढंग से करने के लिए तैयार हैं। यही एक रास्ता है जिसके जरिये हम देश के सभी वर्गों को अपने साथ लेकर चल सकते हैं। एकता का दूसरा कोई मार्ग दिखाई नहीं पड़ता। आइए, हम इस मुद्दे पर संदेह न करें।

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