12 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
खण्ड- II - स्वातन्य-अधिकार
* माननीय सरदार वल्लभ भाई पटेलः खंड II बंधुआ मजदूरी (बलात्-श्रम) के बारे में है। वह इस प्रकार हैः-
‘‘II (क) मानव देह व्यापार, और
(ख) अपराध के दंड के सिवाय जिसके लिए उस पक्षकार को सम्यकतः सिद्ध
दोषी ठहराया गया हो, किसी भी रूप में बंधुआ मजदूरी जिसके
अंतर्गत बेगार और अस्वैच्छिक चाकरी भी है।
एतद्द्वारा प्रतिषिद्ध किए जाते हैं, तथा इस प्रतिषेध का किसी भी प्रकार उल्लंघन अपराध होगा।’’
स्पष्टीकरणः-
** ‘‘इस खण्ड की कोई भी बात राज्य को मूल वंश, धर्म, जाति या वर्ग के आधार पर कोई भेद किए बिना लोक प्रयोजनों के लिए अनिवार्य सेवा अधिरोपित करने से निवारित नहीं करेगी। अब हमें इस पर चर्चा करने का प्रयत्न करना है और उसे संक्षिप्त रूप में ही करना है तथा अलग-अलग खण्डों के बजाय इसे एक बृहत् रूप में रखना है और इसे एक खण्ड ‘मानव देह व्यापार’ में रखना है।’’
*****
डॉ. बी.आर.अम्बेडकर (बंगाल-साधारण) ः मैं जो मुद्दा उठाना चाहता हूँ वह यह है कि जबकि मुझे उपखंड (क) और (ख) को सुसंगत बनाने की दृष्टि से इनके पुनः प्रारुपरण पर कोई आपत्ति नहीं है, मुझे इस बारे में कुछ संदेह है कि क्या स्पष्टीकरण को हटाना सलाहकार समिति के अधिकांश सदस्यों की इस इच्छा के अनुरूप होगा कि राज्य को किसी भी प्रकार अनिवार्य सेवा लेने की शक्ति नहीं होनी चाहिए। श्री मुंशी का सुझाव है कि यदि इस खंड का फिर से प्रारुपण किया जाता है और यदि स्पष्टीकरण का लोप किया जाता है तो भी राज्य को अनिवार्य सैनिक सेवा शुरु करने का अधिकार होगा। मुझे प्रस्तावित परिवर्तन अर्थात् स्पष्टीकरण हटाये जाने के परिणामों पर अपनी बुद्धि का प्रयोग करने के लिए पर्याप्त समय नहीं मिला है, लेकिन मुझे भय है कि स्पष्टीकरण को हटाने और इस खंड को उसी रूप में रखने से जिसमें यह अंकित है प्रतिकूल और गंभीर परिणाम निकलेंगे क्योंकि बेगार भी एक ऐसी चीज है जो राज्य द्वारा अधिरोपित की जाती है। जहां तक मुझे ज्ञात है, मुम्बई में कुछ लोक
*** . सी.ए.डी. खण्ड सी.ए.डी. खण्ड IIIIII, 1 मई 1947, पृष्ठ 428।, 1 मई, 1947, पृष्ठ 480