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प्रयोजनों के लिए सरकार बेगार की मांग करती है, और यदि राज्य को बेगार लेने से निषिद्ध किया गया तो किसी के लिए भी यह तर्क देना पूरी तरह संभव है कि अनिवार्य सैनिक सेवा भी बेगार है। इसलिए मैं इस बात से पूरी तरह संतुष्ट नहीं हूँ कि इस प्रक्रम पर स्पष्टीकरण को हटाना उचित होगा। मैं इस विषय में कोई निश्चित कार्रवाई सुझाने की स्थिति में नही हूँ। किन्तु मेरा विचार है कि यदि मैं सदन का ध्यान उस आशंका की ओर आकृष्ट कर दूँ जो मेरे मन में उस परिणाम के बारे में है जो स्पष्टीकरण को हटाये जाने से या तो सैनिक प्रयोजन के लिए या राज्य को सामाजिक प्रयोजनों के लिए अनिवार्य सेवा के बारे में राज्य की शक्ति पर हो सकती है। मेरा सुझाव है कि इस पक्रम पर हमें स्पष्टीकरण को हटाना नहीं चाहिए, बल्कि यथावत् छोड़ देना चाहिए और जब प्रान्तीय संविधान तथा फेडरल संविधान का अंतिम रुप से प्रारुप किया जाए तभी सम्पूर्ण विषय पर फिर से विचार किया जाए।
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डॉ. बी.आर.अम्बेडकरः क्या मुझे एक सुझाव पेश करने की अनुमति है? हम सर अल्लादी कृष्णास्वामी अय्यर की बहस सुन चुके हैं। उनका कहना है कि संयुक्त राज्य अमेरिका के उच्चतम न्यायालय के विनिर्णयों के उनके पठन के अनुसार, यदि यह स्पष्टीकरण नहीं होगा तो भी राज्य को अनिवार्य सैनिक सेवा लेने की इजाजत होगी। सौभाग्यवश, मुझे भी उन मामलों को देखने का मौका मिला है जिनके बारे में मुझे विश्वास है, सर अल्लादी के मन में हैं। मैं समझता हूँ, वह मेरी बात से सहमत होंगे, यदि वह उच्चतम न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय पर तार्किकता से दृष्टिपात करें तो वह देखेंगे कि वे भी इसी कल्पना पर आधारित थे कि राजनीतिक संगठन में स्वतंत्र नागरिक का कर्तव्य है कि वह सरकार की सहायता करे अतः अनिवार्य सैनिक सेवा में भी नागरिकों से वही कर्तव्य कराने के लिए कहा जाएगा जिसे कहने के लिए वह राज्य के प्रति पहले से ही बाध्य है। मेरा निवेदन है कि राज्य की रक्षा के लिए अनिवार्य सैनिक सेवा की आवश्यकता जैसे महत्वपूर्ण विषय के लिए यह बहुत कच्ची आधारशिला है।
मेरा निवेदन है कि हमें इस प्रकार की तार्किकता से संतुष्ट नहीं होना चाहिए जो भारत में उच्चतम न्यायालय द्वारा अपनाई जाए या न अपनाई जाए। अतः मेरा सुझाव है कि, जैसे नागरिकता विषयक दूसरे खंड की स्थिति में आपने कृपा करके मामला एक छोटी-सी समिति और आगे छानबीन करने के लिए भेज दिया था उसी प्रकार इस विषय में भी यही उचित होगा कि यह प्रश्न भी स्पष्टीकरण के लिए रखा जाए व एक
* . सी.ए.डी. खंड III, 1 मई, 1947, पृष्ठ 483-814।