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में और स्वशासी जिले की जिला परिषद ऐसे क्षेत्रों से भिन्न जो उसे जिले
के भीतर की प्रादेशिक परिषदों के, यदि कोई हों, प्राधिकार के अधीन है,
उस जिले के भीतर के अन्य क्षेत्रों के संबंध में, ऐसे वादों और मामलों के
विचारण के लिए जो वादों और मामलों से भिन्न है जिन पर इस अनुसूची के
पैरा 5 के उपपैरा (1) के उपबंध लागू होते हैं, उस राज्य के किसी न्यायालय
का अपवर्जन करके, ग्राम परिषदों या न्यायालयों का गठन कर सकेगी, और
उपयुक्त व्यक्तियों को ऐसी ग्राम परिषदों के सदस्य अथवा ऐसे न्यायालयों के
पीठासीन अधिकारी के रुप में नियुक्त कर सकेगी और ऐसे न्यायालय को भी
नियुक्त कर सकेगी जो इस अनुसूची के पैरा 3 के अधीन बनाई गई विधियों
के प्रशासन के लिए आवश्यक हों।
(2) इस संविधान में किसी बात के होते हुए भी स्वशासी प्रदेश की प्रादेशिक
परिषद या उस प्रादेशिक परिषद द्वारा इस निमित्त गठित कोई न्यायालय या किसी
स्वशासी जिले के भीतर किसी क्षेत्र के लिए कोई प्रादेशिक परिषद नहीं है तो
ऐसे जिले की जिला परिषद द्वारा इस निमित गठित कोई न्यायालय पक्षकारों के
बीच ऐसे सभी वादों और मामलों के संबंध में जो सब उनसे भिन्न हैं जिन्हें इस
अनुसूची के पैरा 5 के उपपैरा (1) के उपबंध लागू होते हैं, यथास्थिति ऐसे
प्रदेश या क्षेत्र के भीतर अनुसूचित जनजातियां हैं, अपील न्यायालय की शक्तियों
का प्रयोग करेगा, और राज्य में किसी भी अन्य न्यायालय को ऐसे वादों और
मामलों में अपील अधिकारिता नहीं होगी तथा ऐसी प्रादेशिक या जिला परिषद
या न्यायालय का विनिश्चय अंतिम होगा।
- कुछ वादों और अपराधों के विचारण के लिए प्रादेशिक परिषदों और जिला परिषदों को तथा किन्हीं न्यायालयों और अधिकारियों को सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 और दंड प्रक्रिया संहिता, 1898 के अधीन शक्तियों का प्रदान किया जाना-
(1) राज्यपाल, किसी स्वशासी जिले या स्वशासी प्रदेश में किसी ऐसी प्रवृत्त विधि
से, जो ऐसी विधि है जिसे राज्यपाल इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे, उद्भूत वादों
या मामलों के विचारण के लिए अथवा भारतीय दंड संहिता के अधीन या ऐसे
भारतीय जिले या प्रदेश में तत्समय लागू किसी अन्य विधि के अधीन मृत्यु
से, आजीवन शासन से या पांच वर्ष से कम अवधि के कारावास से दंडनीय
अपराधों के विचारण के लिए, ऐसे जिले या प्रदेश या प्राधिकार रखने वाली
जिला परिषद या प्रादेशिक परिषद को अथवा ऐसे जिला परिषद द्वारा गठित