16 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
कम आयु के बालकों के धर्म परिवर्तन का निषेध करने वाला खण्ड है। ऐसे में अनाथ बालकों की क्या हालत होगी? क्या उनका कोई धर्म नहीं होगा? क्या उन्हें किसी के द्वारा जो उनमें कृपा करके रुचि लें, कोई धर्मोपदेश प्राप्त नहीं होगा? मुझे ऐसा लगता है कि यदि श्री मुंशी द्वारा लिपिबद्ध रूप में खण्ड को अंगीकार कर लिया गया अर्थात् यह कि 18 वर्ष से कम आयु के किसी भी बालक का धर्म परिवर्तन नहीं किया जाएगा तो इसका अभिप्राय यह होगा कि जो बालक अनाथ है, जिनके कोई कानूनी अभिभावक नहीं हैं, वे किसी भी प्रकार की धार्मिक शिक्षा प्राप्त नहीं कर सकते। मुझे विश्वास है कि यह सदन इस प्रकार के परिणाम के बारे में सहर्ष सोचेगा भी नहीं। इसलिए ऐसे विषयों को भी मुंशी द्वारा प्रस्तावित संशोधन के प्रवर्तन से बाहर रखना होगा। अब मैं दूसरे वर्ग पर आता हूँ अर्थात् माता-पिता और अभिभावकों वाले बालकों पर। उन्हें दो प्रवर्गों में रखा जा सकता है। स्पष्टता की खातिर, उनके मामलों पर अलग-अलग विचार करना वांछनीय हो सकता है_ प्रथम, वे मामले जिनमें माता-पिता और अभिभावकों की सम्मति से बालकों का धर्म-परिवर्तन किया जाता है। दूसरे वे मामले जिनमें बालकों के माता-पिता ने धर्म परिवर्तन कर लिया हैं।
मुझे ऐसा प्रतीत नहीं होता कि कानूनी अभिभावकों वाले अवयस्क बालकों के धर्म परिवर्तन पर प्रतिषेध होना चाहिए जहाँ धर्म परिवर्तन बालकों के कानूनी अभिभावकों की सम्मति और जानकारी के बिना होता है। मेरे विचार में यह एक बहुत ही विधि सम्मत प्रतिपादन है। किसी भी मिशनरी को, जो ऐसे बालक का धर्म परिवर्तन करना चाहता है जो किसी व्यक्ति के विधिपूर्ण संरक्षकत्व में है। जो संरक्षकत्व विधि के अनुसार उस बालक विशेष के धार्मिक विश्वास को विनियमित तथा नियंत्रित करने के लिए हकदार है। उस व्यक्ति या अभिभावक को इस बात की जानकारी प्राप्त करने के अधिकार से वंचित नहीं करना चाहिए कि बालक का धर्म परिवर्तन किया जा रहा है। मेरे विचार में, यह एक सरल प्रतिपादन है जिस पर कोई आपत्ति नहीं हो सकती।
लेकिन जब हम उस स्थिति पर आते हैं जिसमें माता-पिता का धर्म परिवर्तन हो जाए और हमें उनके बालकों के बारे में विचार करना हो, तो मेरे विचार में हमारा काम अत्यंत दुःसाध्य है-यदि आपका कहना यह है कि भले ही आप धर्म परिवर्तन कर लें क्योंकि वे वयस्क हैं और 18 वर्ष से ऊपर हैं, फिर भी 18 वर्ष से कम आयु के अवयस्क बालकों का भले ही वे उनके बालक हों, धर्म परिवर्तन मां-बाप के साथ नहीं होना है। जिस मुद्दे पर हमें विचार करना है वह यह है कि हम बालकों के बारे में क्या इंतजाम करने जा रहे हैं? मान लीजिए, पिता ने ईसाई धर्म ग्रहण कर लिया है। मान लीजिए उसके बेटे की मौत हो जाती है। पिता ईसाई धर्म के मुताबिक उसका पालन-पोषण करने के कारण मृत बालक को ईसाई रीति-रिवाज के अनुसार दफनाता है। तो क्या पिता का