19
श्री त्यागी द्वारा रखे गए संशोधनों से काफी आश्चर्यचकित हूँ। मेरा निवेदन है कि उन्होंने इस खण्ड 18 को वापस समिति के पास भेजे जाने के लिए कोई कारण नहीं बताए हैं। इस प्रस्ताव के समर्थन में एकमात्र कारण कोई भी भांप सकता है- वह यह है कि अल्पसंख्यकों के अधिकार सापेक्षिक होने चाहिए अर्थात् इससे पहले कि हम यह तय करें कि हम हिन्दोस्तानी राज्य क्षेत्र में अल्पसंख्यकों को क्या अधिकार देना चाहते हैं। हमें इंतजार करना चाहिए और यह देखना चाहिए कि पाकिस्तानी सभा अल्पसंख्यकों को क्या अधिकार देती है। अब, श्रीमान्, पूर्ण आदर के साथ, मैं ऐसे किसी भी विचार की निन्दा करता हूँ। अल्पसंख्यक वर्गों के अधिकार पूर्ण अधिकार होने चाहिए। वे किसी भी विचारणा के अधीन नहीं रहने चाहिए कि दूसरा पक्ष अपने अधिकार-क्षेत्र के अन्तर्गत अल्पसंख्यक वर्गों के प्रति क्या करना चाहता है। यदि हम यह देखें कि कुछ अल्पसंख्यक वर्गों को जिनमें हम हितबद्ध हैं और जो किसी दूसरे राज्य के अधिकार-क्षेत्र के अन्तर्गत हैं, वही अधिकार नही मिले हैं जो हमने अपने राज्य-क्षेत्र के अल्पसंख्यक वर्गों को दिए हैं तो राज्य राजनयिक ढंग से मामले को उठाये और देखें कि गलतियां सुधारी जाएं। लेकिन कोई बात नहीं, दूसरे कुछ भी करते हों, हमें वही करना चाहिए जो हमारे निर्णय में ठीक है और व्यक्तिगत तौर पर मेरा विचार है कि खण्ड 18 में जो अधिकार इंगित किए गए हैं, वे ऐसे अधिकार हैं जिनका दावा करने के लिए हर अल्पसंख्यक वर्ग, किसी अन्य विचारणा के बावजूद, हकदार है। हमने जो पहला अधि कार दिया है वह है अपनी भाषा, लिपि और संस्कृति के इस्तेमाल का अधिकार। हमारा कथन है कि ‘‘राज्य की शिक्षा-संस्थाओं में प्रवेश के विषय में ‘‘धर्म, भाषा आदि के आधार पर कोई विभेद नहीं किया जाएगा। हमने कहा है कि ‘‘किसी भी अल्पसंख्यक वर्ग को उसकी इच्छा की शिक्षा संस्था को स्थापित करने से रोका नहीं जाएगा। उसमें यह भी कहा गया है कि जब कभी कोई राज्य यह विनिश्चय करेगा कि अल्पसंख्यक वर्ग द्वारा चलाये जा रहे विद्यालय या अन्य शिक्षा संस्थाओं को सहायता दी जाए, तो वह धर्म, सम्प्रदाय या भाषा के आधार पर अनुदान देने के मामले में भेदभाव नहीं बरतेगा। श्रीमान्, मेरी समझ में नहीं आता कि खंड 18 में समाविष्ट अधिकारों पर कोई आपत्ति कैसे हो सकती है। जो भी हो, जिसने इस प्रस्ताव का समर्थन किया है कि इस खण्ड को वापस समिति को भेज दिया जाए उसने ऐसा कोई तर्क पेश नहीं किया है कि या तो ये अधिकार उनसे अधिक हैं जो अल्पसंख्यक वर्ग को मिलने चाहिए अथवा ऐसे हैं कि वे अल्पसंख्यक वर्ग को मिलने नहीं चाहिए। इसलिए, मुझे यह अत्यंत शोचनीय प्रतीत होता है कि तीन समितियों का श्रम, जिन्होंने इन उपबंधों को बनाया है, मात्र इसलिए अशिष्ट ढंग से निरस्त कर दिया जाए कि कुछ कारणों से कुछ लोग चाहते हैं कि इस मामले को वापस समिति को भेज दिया जाये। मुझे नहीं मालूम कि मेरे मित्र श्री मुंशी को वर्तमान रूप में उपखंड (2) पर क्या आपत्ति है, लेकिन यदि यह आवश्यक