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1. मूल अधिकारी उपसमिति_
2. अल्पसंख्यक उपसमिति_
3. उत्तर पूर्व सीमान्त जनजातीय क्षेत्र उपसमिति_
4. अपवर्जित और आंशिक रुप से अपवर्जित क्षेत्र (असम के क्षेत्रों से भिन्न)
उपसमिति।
डॉ. अम्बेडकर पहली दो उपसमितियों के सदस्य थे और उन्होंने इनकी कार्यवाहियों में गहरी रूचि ली थी। उन्होंने मूल अधिकार उपसमिति को एक ज्ञापन भी पेश किया था जिसमें उन्होंने अपने विचारों को साकार रूप दिया था। बाद में ‘‘राज्य और अल्पसंख्यक वर्ग, उनके अधिकार क्या हैं और स्वतंत्र भारत के संविधान में उन्हें वे कैसे दिलवाये जाएं’’ शीर्षक से इस ज्ञापन को व्यापक प्रचार के लिए प्रकाशित किया था।
संविधान सभा ने अन्य तीन समितियां भी नियुक्त की। वे थी-(1) संघीय शक्ति समिति, (2) संघीय संविधान समिति, (3) अनंतिम संविधान समिति। पहली दो समितियों के सभापति पंडित जवाहर लाल नेहरु थे, जबकि तीसरी समिति के सभापति सरदार वल्लभभाई पटेल थे। इन समितियों की स्थापना 30 अप्रैल, 1947 को एक संकाय द्वारा की गई थी।
डॉ. अम्बेडकर संघीय संविधान समिति के सदस्य थे। समिति की रिपोर्ट उसके सभापति द्वारा 4 जुलाई, 1947 को संविधान सभा के सभापति के समक्ष पेश की गई थी। सभा की विभिन्न उपसमितियों में डॉ. अम्बेडकर ने जो कार्य किया था, वह बहुत उपयोगी माना गया और कांग्रेस आलाकमान उससे आश्वस्त हो गए। उन्हें इसमें संदेह नहीं रहा कि डॉ. अम्बेडकर की सेवाओं के बिना विधायन और स्वतंत्रता की मजबूती को साकार करना आसान नहीं होगा। बंगाल के विभाजन की वजह से डॉ. अम्बेडकर संविधान सभा के सदस्य नही रहे। कांग्रेस पार्टी ने आगे आकर उन्हें सभा में सदस्यता के लिए प्रायोजित किया। इससे पहले कांग्रेस पार्टी ने संविधान सभा में उनके प्रवेश पर एड़ी-चोटी का जोर लगाकर विरोध किया था।
तारीख 30 जून, 1947 के अपने पत्र में डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, सभापति संविधान सभा ने बुम्बई के तत्कालीन प्रधान मंत्री श्री बी.जी. खरे से अनुरोध किया कि डॉ. अम्बेडकर को तुरंत निर्वाचित किया जाए। उन्होंने लिखा था- ‘‘अन्य किसी भी बात के अलावा, हमने देखा कि संविधान सभा में और उन विभिन्न समितियों में जिनमें डॉ. अम्बेडकर को नियुक्त किया गया था, दोनों में डॉ. अम्बेडकर का काम इतना श्रेष्ठ है कि यह आवश्यक है कि हमें उनकी सेवाओं से वंचित नहीं रहना चाहिए। जैसा कि आप जानते हैं, वह बंगाल में चुने गए थे