7. संविधान सभा नियमों में नये नियम 38क से 38 जोड़ना - Page 60

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सकता है 31 मार्च और संविधान के प्रारंभ होने के बीच एक या दो मास का अंतराल रह जाए। उसी प्रकार यह भी संभव है कि इस सदन द्वारा निर्मित और पारित सम्पूर्ण संविधान एक बार में प्रभावी न हो। वह खण्ड-खण्ड में प्रभावी हो। हो सकता है परिणामिक विषयों को प्रभावी रुप देने के लिए निर्वाचन-क्षेत्रों को परिनिश्चित करने के प्रयोजनार्थ संक्रमणकालीन, अनुपूरक उपबंध रखने पड़ें। निस्संदेह इन सबके लिए समय चाहिए। परिणामस्वरुप, संविधान के अनुकूलन की प्रक्रिया जो 31 मार्च को समाप्त हो जाएगी, निरन्तर जारी रखनी होगी और ऐसा इस सदन द्वारा पारित विधेयक की ज्ञात प्रक्रिया से ही हो सकता है।

इसके प्रकाश में यह बात साफ हो जाएगी कि विधेयक द्वारा वर्तमान संविधान में परिवर्तन के लिए उपबंध जरूरी है जो इस बात को समझते हैं तथा यह भी समझते हैं कि अनुकूलन का वह प्रयोजन नहीं है जो संविधान के संशोधन के विधेयक का है। वे ऐसे उपबंध की विधिमान्यता को चुनौती नहीं देना चाहेंगे जिसके अनुसार विधेयक पर गवर्नर जनरल की अनुमति लेना आवश्यक है। यदि दोनों का उद्देश्य एक ही है और यदि अनुकूलन के लिए गवर्नर जनरल की अनुमति चाहिए तो सवाल उठता है कि संशोधन विधेयक पर गवर्नर जनरल को अनुमति की अपेक्षा क्यों न हो? निश्चय ही तर्क की दृष्टि से यह कतई असंगति नहीं है। मैं यह भी बताना चाहूँॅगा कि समिति बहुत हद तक स्वाधीनता अधिनियम की धारा 6 की उपधारा (3) के उपबंध से मार्गदर्शित थी। उसका कहना है कि डोमीनियन मंडल द्वारा पारित सब विधियों पर गवर्नर जनरल की अनुमति ली जाएगी। इस खंड का अभिप्राय क्या है आज यह अनिश्चित है। गवर्नर जनरल को अनुमति देने की शक्ति है। सवाल यह है कि क्या इसका अर्थ यह है कि सभा वर्तमान संविधान का संशोधन विधेयक गर्वनर जनरल को इस तथ्य के फलस्वरूप पेश करने के लिए आबद्ध है कि उन्हें स्वाधीनता अधिनियम द्वारा अनुमति की शक्ति प्रदान की गई है? हम कोई सुस्पष्ट जवाब देने में समर्थ नहीं थे। हमारा विचार था कि यह तर्क व्यवहार्य होते हुए भी कि धारा 6 में उपधारा (3) के विद्यमान होने मात्र से संशोधन विधेयक अनुमति के लिए गवर्नर जनरल के समक्ष पेश करने की बाध्यता नहीं है_ हो सकता है न्यायालय अन्यथा अभिनिर्धारित करे और इस सभा द्वारा पारित किन्तु अनुमति के लिए गवर्नर जनरल को प्रस्तुत न किए गए विधेयक को शक्तिबाह्य घोषित कर दें। हम नहीं चाहते कि सभा द्वारा पारित विधेयक को ऐसे संकट में डाला जाए। इसलिए पूरी सावधानी बरतने के बाद ही और महसूस करने पर भी कि इसमें कुछ भी तर्कहीनता नहीं है यह नया नियम जोड़ा गया है। आशा है कि सदन इस बात को समझेगा

* . संविधान सभा वाद-विवाद, शासकीय रिपोर्ट, खण्ड 6, 27 जनवरी, 1948, पृष्ठ 32-33 ।