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अतिरिक्त रक्षोपाय समाविष्ट किया गया है।
अतः हम निर्भय होकर कह सकते हैं कि भारतीय परिसंघ को अनम्यता या विधि कता के दोषों से कोई नुकसान नहीं होगा। लचीलापन इसकी सुभिन्न विशेषता है।
प्रस्तावित भारतीय परिसंघ की एक विशेषता है जो इसे दूसरे परिसंघों से अलग करती है। चूंकि परिसंघ विभक्त प्राधिकार पर आधारित दोहरा शासनतंत्र होता है जिसमें दोनों शासनतंत्रों के पास पृथक-पृथक विधायी, कार्यपालक और न्यायिक शक्तियाँ होती हैं। अतः दोनों शासनतंत्रों में प्रत्येक के कानूनों में, प्रशासन में और न्यायिक संरक्षण में विविधता आना अनिवार्य है। एक बिंदु तक तो इस विविधता से कोई अन्तर नहीं पड़ता। शासन की शक्तियों को स्थानीय जरुरतों और स्थानीय अवस्थाओं के अनुरुप ढालने का प्रयास स्वागत योग्य हो सकता है। लेकिन जब यह विविधता एक बिंदु को पार कर जाती है तो अव्यवस्था फैल जाती है और अनेक परिसंघीय राज्यों में ऐसा हुआ भी है।
यदि हमारे संघ में बीस राज्य हैं तो न्याय पाने के लिए तथा प्रशासन के मानदंडों और पद्धतियों में प्रक्रियाओं की, विवाद की, तलाक की, सम्पत्ति की विरासत की, कुटुम्ब संबंधों की संविदाओं, अपकृत्यों, अपराधों, बांट और माप की, बिलों और चेकों की, बैंकिंग और वाणिज्य की बीस विभिन्न विधियों की हमें कल्पना करनी ही होगी। ऐसी स्थिति न केवल राज्य को कमजोर करती है बल्कि उन नागरिकों के लिए जो एक राज्य से दूसरे राज्य में आते-जाते हैं, यह देखकर कष्टदायक हो जाती है कि एक राज्य में जो विधिपूर्ण है वही दूसरे राज्य में विविधपूर्ण नहीं है। प्रारूप संविधान में, ऐसे साधनों और पद्धतियां को ढूंढ निकालने का प्रयास किया गया है जिनके द्वारा भारत में परिसंघ होगा और साथ ही सभी मूलभूत विषयों में एकरुपता होगी जो देश की एकता बनाए रखने के लिए अनिवार्य है। प्रारूप संविधान में अंगीकृत साधनों की संख्या तीन हैः-
(1) एकल न्यायपालिका,
(2) सिविल, दाण्डिक मूल विधियों में एकरूपता_
(3) महत्वपूर्ण पदों के लिए एक सामान्य अखिल भारतीय सेवा।
जैसा कि मैने कहा था, दोहरी न्यायपालिका, दोहरी कानून संहिताएं और दोहरी सिविल सेवाएं, दोहरे शासनतंत्र के तार्किक परिणाम हैं जो एक परिसंघ में अन्तर्निहित हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका में, परिसंघ न्यायपालिका और राज्य न्यायपालिका एक-दूसरे से पृथक और स्वतंत्र है। हालांकि भारतीय परिसंघ का शासनतंत्र दोहरा है फिर भी इसकी न्यायपालिका कतई दोहरी नहीं है। उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय से मिलकर एक अखंड न्यायपालिका बनती है और उन्हें सांविधानिक विधि, सिविल विधि या दंड विधि के अधीन उत्पन्न होने वाले सभी मामलों में अधिकारिता होती है और वे उनमें उपचार देती है। यह समस्त उपचारात्मक प्रक्रिया में विषमता को दूर करने के लिए किया