56 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
गया है। कनाडा ही एकमात्र देश है जो इसके काफी समतुल्य है। आस्ट्रेलियाई प्रणाली तो केवल समतुल्यप्राय है।
उन विधियों में व्याप्त समस्त विषमताओं को दूर करने का ध्यान रखा गया है जो नागरिक एवं नियमित जीवन का आधार है। सिविल और दांडिक विधियों की महान संहिताएं जैसे सिविल प्रक्रिया संहिता, दंड संहिता और दंड प्रक्रिया संहिता, साक्ष्य अधिनियम, संपत्ति अंतरण अधिनियम, विवाह, तलाक और विरासत की विधियां समवर्ती सूची में रखी गई हैं ताकि परिसंघीय व्यवस्था को छिन्न-भिन्न किए बिना आवश्यक एकरूपता को हमेशा के लिए अनाया जा सके।
जैसा कि मैंने कहा था, दोहरा शासनतंत्र, जो परिसंघीय प्रणाली में अंतर्निहित है, सभी परिसंघों में दोहरी सेवा द्वारा अपनाया जाता है समस्त परिसंघों में, एक परिसंघ सिविल सेवा होती है और एक राज्य सिविल सेवा। हालांकि भारतीय परिसंघ एक दोहरा शासनतंत्र है और दोहरी सेवा होगी लेकिन एक अपवाद के साथ यह माना जाता है कि प्रत्येक देश में उसके प्रशासन में कुछ पद ऐसे होते हैं जिन्हें प्रशासन स्तर बनाए रखने की दृष्टि से नीतिपरक कहा जा सकता है। एक विशाल और जटिल प्रशासनतंत्र में ऐसे पदों का पता लगाना आसान नहीं है। लेकिन इसमें कोई शक नहीं हो सकता कि प्रशासन स्तर उन सिविल सेवकों के चरित्रबल पर निर्भर करता है जिन्हें इन नीतिपरक पदों पर नियुक्त किया जाता है। हमारा सौभाग्य है कि हमें प्रशासनतंत्र विरासत में मिला है जो पूरे देश के लिए एक-सा है और हमें मालूम है कि वे नीतिपरक पद कौन-कौन से हैं। संविधान में उपलब्ध है कि राज्यों को अपनी निजी सिविल सेवाएं बनाने के अधिकार से वंचित किए बिना भर्ती अखिल भारतीय आधार पर की जाएगी और पूरे संघ में इन नीतिपरक पदों पर उसी सेवा के सदस्यों को नियुक्त किया जाएगा। हमारे प्रस्तावित परिसंघ की यही विशेषताएं हैं। अब मैं इस पर आता हूँ कि इसके बारे में आलोचकों का क्या कहना है?
कहा जाता है कि प्रारुप संविधान में कुछ भी नया नहीं है। लगभग आधा भाग भारत शासन अधिनियम, 1935 से नकल किया गया है शेष अन्य देशों के संविधानों से लिया गया है। मौलिकता के नाम पर बहुत कम है।
कोई पूछ सकता है कि विश्व के इतिहास में इस समय बनाये गए संविधान में क्या कोई नयी चीज हो सकती है। प्रथम लिखित संविधान बने एक सौ से भी ज्यादा वर्ष बीत चुके हैं। उनके देशों ने अपने संविधान को लेखबद्ध करते समय इसका अनुसरण किया है।
संविधान का विस्तार-क्षेत्र क्या हो यह अब काफी अरसे से निर्धारित है। इसी प्रकार संविधान के मूलतत्वों को भी संपूर्ण विश्व में मान्यता प्राप्त है। इन तत्वों के होते हुए