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संविधान अपने प्रमुख प्रावधानों में एक से ही दिखाई देंगे। यदि इतने वर्षों बाद रचित संविधान में कोई चीज नई हो सकती है तो वह है कुछ फेरबदल जो कमियों को दूर करने के लिए और देशों की जरूरतों के अनुरूप ढालने के लिए किए जाते हैं। अन्य देशों के संविधानों की आंख मूंदकर नकल करने का आरोप, मुझे यकीन है, यह आरोप संविधान के अधूरे अध्ययन के कारण लगाया जाता है। मैं यह दिखा चुका हूँ कि प्रारुप संविधान में क्या-क्या नया है और मुझे यकीन है कि जिन लोगों ने संविधान का अध्ययन किया है जो इस विषय पर सहज भाव से विचार करने को तैयार हैं वे सहमत होंगे कि प्रारुपण समिति अपना कर्तव्य करने में उतने अंधानुकरण और नकल की दोषी नहीं है जितनी बताई जाती है।
जहां तक इस आरोप का संबंध है क्रियारूप संविधान में भारत शासन अधिनियम, 1935 के उपबंधों का एक बहुत बड़ा भाग अंगीकार कर लिया गया है, मुझे कोई क्षमायाचना नहीं करनी। उधार लेने में लज्जा की कोई बात नहीं है। इसमें कोई चोरी नहीं की गई है। संविधान के मूलभूत विचारों में के पेटेन्ट अधिकार किसी की पूंजी नहीं है। मुझे खेद इस बात की है कि भारत शासन अधिनियम, 1935 से लिए गए उपबंध अधिकांशतः विवरण से संबंधित हैं। मैं इस बात से सहमत हूँ कि प्रशासनिक विवरण का संविधान में कोई स्थान नहीं होना चाहिए मेरी हार्दिक इच्छा है कि प्रारुपण समिति संविधान में उन्हें समाविष्ट करने से बचकर आगे बढ़ सकती थी। लेकिन इन्हें आवश्यक बताया गया है जिसकी वजह से उन्हें समाविष्ट करना न्यायोचित ठहराया गया। ग्रीस के इतिहासकार ग्रोटे का कहना है कि ‘‘किसी समाज ने बहुसंख्यक में ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण समाज में संविधानिक नैतिकता का विसरण अभी-अभी स्वतंत्र और शांति चाहने वाले शासन की अभिन्न शर्त है, क्योंकि कोई शक्तिशाली तथा दुराग्रही अल्पसंख्यक भी जो इतना मजबूत ना हो कि वह अपने आपको सत्तारुढ़ कर सके, एक स्वतंत्र संस्था का काम करना असाध्य बना सकता है।’’
संविधानिक नैतिकता से ग्रोटे का अभिप्राय था- ‘संविधान के स्वरुपों के लिए सर्वोपरि श्रद्धा, इन स्वरूपों के अधीन और इनके अंतर्गत कार्य करते हुए प्राधिकारी की आज्ञा मनवाना, फिर भी साथ ही निश्चित कानूनी नियंत्रण के अधीन होते हुए मुक्त भाषण की कार्रवाई की आदत के साथ, तथा उन प्राधिकारियों के समस्त सार्वजनिक कृत्यों के विषय में उनकी अबाध आलोचना (सेंसर) जो कि दलगत मुकाबलों की कटुता के बीच हर नागरिक के मन में इस पूर्ण आस्था से युक्त भी हो कि संविधान के स्वरूप उनकी अपनी दृष्टि की अपेक्षा विपक्षियों की नजर में कम पवित्र नहीं होंगे।’
(सुनिए, सुनिए)
जबकि हर कोई इस बात को मानता है कि एक लोकतांत्रिक संविधान के शांतिपूर्ण कार्यान्वयन के लिए संविधानिक नैतिकता का विसरण आवश्यक है, दो चीजें ऐसी हैं