प्रारुप संविधान का प्रथम वाचन - Page 77

58 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

जो उसमें अंतर सम्बध है जिन्हें दुर्भाग्यवश आमतौर पर मान्यता प्राप्त नहीं होती है। एक यह कि प्रशासन के स्वरूप का संविधान के स्वरूप से गहरा संबंध है। प्रशासन का स्वरूप संविधान के स्वरूप के लिए और उसी अर्थ में समुचित होना चाहिए। दूसरे यह कि संविधान का स्वरुप बदले बिना केवल प्रशासन का स्वरूप बदलकर और उसे संविधान की भावना से असंगत एवं प्रतिकूल बनाकर संविधान को निर्धारित करना पूरी तरह संभव है। अभिप्राय यह है कि जहां लोग संविधानिक नैतिकता से ओत-प्रोत होते हैं जिसका उल्लेख इतिहासकार ग्रोटे ने किया है कि हम संविधान से प्रशासन के विस्तृत विवरण के लोन का जोखिम उठा सकते हैं और उन्हें विहित करने का काम विधानमंडल पर छोड़ सकते हैं। प्रश्न यह है कि क्या हम संविधानिक नैतिकता के ऐसे विसरण को मान कर चल सकते हैं? संविधानिक नैतिकता एक नैसर्गिक संवेग नहीं है और इसे अभी सीखना है। भारत में लोकतंत्र भारतीय जमीन पर केवल ऊपरी हिस्से में है जो अनिवार्यतः अलोकतांत्रिक है।

इन परिस्थितियों में यह अधिक बुद्धिमतापूर्ण होगा कि प्रशासन के स्वरूप को विहित करने के लिए विधानमंडल पर विश्वास न किया जाए। उन्हें संविधान में समाविष्ट करने का यही औचित्य है।

प्रारुप संविधान की दूसरी आलोचना यह है कि इसका कोई भी भाग भारत के प्राचीन राजतंत्र को नहीं दर्शाता। कहा जाता है कि नए संविधान का प्रारुपण राज्य के प्राचीन हिन्दू मॉडल पर आधारित होना चाहिए और यह कि पाश्चात्य विचारधाराओं का समावेश करने के बजाय नया संविधान ग्राम पंचायतों तथा जिला पंचायतों पर खड़ा और निर्मित किया जाना चाहिए था। दूसरे लोग भी हैं जिन्होंने इस अतिवादी दृष्टिकोण को अपनाया है। वे कोई केन्द्रीय या प्रांतीय सरकार नहीं चाहते। वे चाहते हैं कि भारत में बहुत सारी ग्राम पंचायतें हों। ग्रामीण समाज के लिए बौद्धिक भारतीयों का स्नेह, स्नेह निसंदेह यदि दयनीय नहीं हो, असीम स्नेह है (हंसी)। इसका अधिकांश कारण मैटकाफ द्वारा की गई उसकी भूरी-भूरी प्रशंसा है। उनका कहना था कि ये छोटे-छोटे गणराज्य हैं और उनके पास वह सब कुछ है जो उन्हें चाहिए। वे विदेशी संबंधों से स्वतंत्र प्राय है। प्रत्येक ग्राम समाज अपने आप में एक छोटा सा राज्य है। मैटकाफ के अनुसार इन्हीं समाजों ने भारत के लोगों के सामने आने वाली समस्त क्रांतियों और उनके परिरक्षित रहने में सर्वाधिक योगदान किया है, और वे उनकी खुशी तथा स्वतंत्रता और अधिकांश स्वाधीनता का आनंद लेने में बहुत अधिक सहायक रहे हैं। इसमें कोई शक नहीं है कि ग्राम समाज जीवित रहते हैं जबकि अन्य कुछ भी जीवित नहीं रहता। लेकिन जो लोग इन ग्राम समाजों पर गर्व करते हैं वे यह भी नहीं सोचते कि उन्होंने देश के कार्यकलापों और देश की नियति में कितनी कम भूमिका निभायी है और क्यों? देश की नियति में उनकी भूमिका के बारे में मैटकाफ ने सुंदर वर्णन किया है। उनका कहना हैः-