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‘‘राजवंश पर राजवंश धराशायी हो जाते हैं। क्रांति के बाद फिर क्रांति आती है। हिन्दू, पठान, मुगल, मराठा, सिख, अंग्रेज सबने राज किया किन्तु ग्राम समाज ज्यों के त्यों बने रहे। आपातकाल में वे हथियार बंदी व किलेबंदी करके अपनी रक्षा अपने आप कर लेते हैं। जब कोई शत्रु सेना गांव से होकर गुजरती है तो ग्राम समाज अपनी चारदीवारी में अपने पशुओं को इकट्ठा कर लेते है और शत्रु को चुपचाप भड़के बिना गुजर जाने देते हैं।’’ ग्राम समाजों ने अपने देश के इतिहास में यही भूमिका निभायी है। यह मानते हुए हम उन पर कितना गर्व महसूस कर सकते हैं? वे सब संकटों में भी बचे रहे, यह एक तथ्य है लेकिन जीवित रहना मात्र महत्वपूर्ण नहीं है। सवाल यह है कि किस जमीन पर वे जीवित रहे हैं। निश्चय ही, एक निचले और स्वार्थी स्तर पर। मैं यह मानता हूँ कि ये ग्राम गणराज्य भारत के अवशेष रहे हैं। इसलिए मुझे ताज्जुब है कि जो लोग प्रान्तीयता और साम्प्रदायिकता की आलोचना करते हैं, वही गाँवों के कट्टर समर्थक बन रहे हैं। गांव क्या है? गाँव स्थानीयता की कोरी अज्ञानता, संकीर्णता और साम्प्रदायिकता का बसेरा मात्र है। मुझे खुशी है, प्रारुप संविधान में गांव को नहीं अपनाया गया है तथा व्यष्टि को अपनी इकाई माना गया है।’’
प्रारुप संविधान की इसलिए भी आलोचना की जाती है कि इसमें अल्पसंख्यकों के लिए रक्षोपायों की व्यवस्था की गई है। इसमें प्रारुप समिति की कोई जिम्मेदारी नहीं है, उसने संविधान सभा का अनुसरण किया है। जहां तक मेरा सवाल है, मुझे कोई शक नहीं है कि संविधान सभा ने अल्पसंख्यकों के लिए ऐसे रक्षोपायों की व्यवस्था करके बुद्धिमता का काम किया है। इस देश में अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक दोनों गलत मार्ग पर चले हैं। बहुसंख्यक के लिए अल्पसंख्यक के अस्तित्व को नकारना गलत है। इसका कोई हल खोजा जाए जो दोहरा प्रयोजन सिद्ध करे वह हल ऐसा हो जो शुरु-शुरु में अल्पसंख्यकों के अस्तित्व को माने। वह हल ऐसा हो कि बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक दोनों मिलकर एक हो जाएँ। संविधान सभा द्वारा प्रस्तावित समाधान स्वागत योग्य है क्योंकि वह समाधान दोहरा प्रयोजन पूरा करता है। उन दुष्टों से जो अल्पसंख्यक के संरक्षण के विरोध में कट्टरता जैसी स्थिति पैदा करते हैं, मैं दो बातें कहना चाहूँॅगा। एक, अल्पसंख्यक एक ताकत है जो प्रस्फुटित हो जाए तो राज्य के सम्पूर्ण कलेवर को उड़ा सकती है। यूरोप का इतिहास इस बात का पर्याप्त और दयनीय प्रमाण है। दूसरी, यह है कि भारत के अल्पसंख्यक अपना अस्तित्व बहुसंख्यक के हाथों सौंपने के लिए राजी हो गए हैं। आयरलैंड का विभाजन रोकने के लिए बातचीत के इतिहास में रेडमड ने कार्सन से कहा था-‘प्रोटेस्टेंट के अल्पसंख्यक के लिए आप जो भी चाहे रक्षोपाय मांग लें, लेकिन हमें अखंड आयरलैंड चाहिए।’’ कार्सन का जवाब था, ‘‘अपने रक्षोपायों की बात मत करिए, हम आपके द्वारा शासित नहीं होना चाहते।’’ भारत में किसी भी अल्पसंख्यक ने यह बात नहीं उठाई, उन्होंने बहुसंख्यक शासन निष्ठापूर्वक स्वीकार कर