प्रारुप संविधान का प्रथम वाचन - Page 79

60 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

लिया है जो मूलतः साम्प्रदायिक बहुसंख्यक हैं न कि राजनीतिक बहुसंख्यक। यह समझना बहुसंख्यक का कर्तव्य है कि वह अल्पसंख्यकों का शोषण न करें। अल्पसंख्यक रहेंगे अथवा लुप्त हो जाएंगे वह इसी बात पर निर्भर करेगा। ज्यों ही बहुसंख्यक अल्पसंख्यक के खिलाफ भेदभाव करने की आदत को छोड़ देगा त्यों ही अल्पसंख्यक के पास अपने अस्तित्व का कोई आधार नहीं रह जाएगा। वे लुप्त हो जाएंगे।

सबसे अधिक आलोचना प्रारुप संविधान के उस भाग पर ही की जाती है जो मूल अधिकारों के विषय में है। कहा जाता है कि अनुच्छेद 13 जिसमें मूल अधिकारों की परिभाषा दी गई है, इतने सारे अपवादों से भरा पड़ा है कि अपवाद मूल अधिकारों को ही निगल गए हैं। इसे भ्रम जैसा बताकर इसकी निंदा की जाती है। आलोचकों की राय में मूल अधिकार तब तक मूल अधिकार नहीं है जब तक वे पूर्ण अधिकार न हों। आलोचकों ने अपनी दलील के समर्थन में संयुक्त राज्य के संविधान और उस संविधान के प्रथम दस संशोधनों में समाविष्ट बिल ऑफ राइट्स का सहारा लिया है। कहा जाता है कि अमेरिकन बिल ऑफ राइट्स में अंकित मूल अधिकार वास्तविक मूल अधिकार हैं क्योंकि वे परिसीमाओं या अपवादों के अधीन नहीं है।

मुझे अफसोस है कि मूल अधिकारों से संबधित सम्पूर्ण आलोचना भ्रामक धारणा पर आधारित है। पहले तो, यह आलोचना निराधार है कि मूल अधिकार गैर मूल अधिकारों से सुभिन्न हैं। यह गलत है कि मूल अधिकार पूर्ण हैं जबकि गैर मूल अधिकार पूर्ण नहीं हैं। दोनों में वास्तविक अंतर यह है कि गैर मूल अधिकार पक्षकारों में समझौते से सृष्ट होते हैं जबकि मूल अधिकार कानून की देन होते हैं। मूल अधिकार राज्य के उपहार की देन हैं, इसका यह तात्पर्य नहीं है कि राज्य उन पर पाबंदियां नहीं लगा सकता।

दूसरे, यह कहना गलत है कि अमेरिका में मूल अधिकार पूर्ण हैं।

अमरीकी संविधान और प्रारुप संविधान में अंतर प्रारुप का है न कि सार का। यह संदेह से परे है कि अमेरिका में मूल अधिकार पूर्ण नहीं हैं। प्रारुप संविधान में वर्णित मूल अधिकारों के प्रत्येक अपवाद के समर्थन में हम संयुक्त राज्य उच्चतम न्यायालय के कम-से-कम एक निर्णय का हवाला दे सकते हैं। प्रारुप संविधान में अनुच्छेद 13 में अंकित स्वतंत्र भाषण के अधिकार पर पाबंदी के औचित्य में उच्चतम न्यायालय का एक निर्णय उद्धृत करना पर्याप्त होगा। गिटलो बनाम न्यूयार्क वाले मामले में जो प्रश्न उठा था वह न्यूयार्क क्रिमिनल अंनारकी कानून की सांविधानिकता का था। उस कानून का प्रयोजन हिंसात्मक परिवर्तन लाने के उद्देश्य से बोले गए शब्दों के लिए दंडित करना था। उसमें उच्चतम न्यायालय ने कहा था-

‘‘यह सुस्थापित मूलभूत सिद्धांत है कि संविधान द्वारा प्रदत्त भाषण और प्रेस की स्वतंत्रता ऐसा पूर्ण अधिकार प्रदान नहीं करती कि कोई जो चाहे बिना जिम्मेदारी के