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बोले या प्रकाशित करे, अथवा अप्रतिबंधित और अनियंत्रित लाइसेंस नहीं देती जो भाषा के हर संभव प्रयोग की छूट देता हो और इस स्वतंत्रता का दुरुपयोग करने वालों को दंडित करने से रोकता हो।’’
इसलिए यह कहना गलत है कि अमेरिका में मूल अधिकार पूर्ण हैं जबकि प्रारुप संविधान में दिए गए मूल अधिकार पूर्ण नहीं हैं।
इस बात से सहमति है कि यदि किन्ही मूल अधिकारों पर पाबंदी जरुरी है तो वे पाबंदियां स्वयं संविधान में ही दी जानी चाहिएं जैसा कि संयुक्त राज्य के संविधान में है और जहाँ ऐसा नहीं है वहाँ यह न्यायपालिका पर छोड़ दिया जाना चाहिए कि वह सब सुसंगत बातों पर विचार करके उसे अवधारित करे। मुझे खेद है कि यह सब अमेरिकी संविधान की नासमझी नहीं तो एकदम गलत बयानी है। अमेरिकी संविधान ऐसा कुछ नहीं करता। एक विषय अर्थात् विधानसभा के अधिकार के सिवाय अमेरिकी संविधान अमेरिका के नागरिकों का प्रत्याभूत मूल अधिकारों पर स्वयं कोई पाबंदियां अधिरोपित नहीं करता। और न ही यह कहना सही है कि अमेरिकी संविधान ने मूल अधिकारों पर पाबंदियां लगाने का काम न्यायपालिका पर छोड़ दिया है। पाबंदियां अधिरोपित करने का अधिकार कांग्रेस का है। वास्तविक स्थिति आलोचकों की धारणा से भिन्न है। अमेरिका में संविधान द्वारा अधिनियमित रुप में मूल अधिकार निसंदेह पूर्ण थे। किन्तु कांग्रेस ने शीघ्र ही देखा कि इन मूल अधिकारों को पाबंदियों से सीमित करना एकदम जरूरी है। जब इन प्रतिबंधों की संविधानिकता संबंधी प्रश्न उच्चतम न्यायालय के समक्ष उठाते यह दलील दी गई कि संविधान ने कांग्रेस को ऐसा कोई प्रतिबंध लगाने की शक्ति नहीं दी है। उच्चतम न्यायालय ने पुलिस शक्ति का सिद्धांत प्रतिपादित किया तथा पूर्ण मूल अधि कारों की वकालत का यह तर्क देकर खंडन किया कि हरेक राज्य में पुलिस शक्ति अन्तर्निहित है जो उसे संविधान द्वारा अभिव्यक्त राज्य से प्रदत्त करने की अपेक्षा नहीं है। उल्लिखित मामले में, उच्चतम न्यायालय के शब्दों में-
‘‘राज्य पुलिस शक्ति का प्रयोग करते हुए उन्हें दंड दे सकता है जो सार्वजनिक कल्याण पर प्रहार करने वाले शब्द बोलकर इस स्वतंत्रता का दुरुपयोग करें, जिससे लोकाचार भ्रष्ट हो जाए, अपराध करने के लिए दुष्प्रेरित करे या लोक शांति भंग करे, और इसे चुनौती नहीं दी जा सकती।’’
प्रारुप संविधान के अंतर्गत, मूल अधिकारों को पूर्ण बनाने और पुलिस शक्ति का सिद्धांत प्रतिपादित करके संसद का बचाव करने के लिए उच्चतम न्यायालय पर निर्भर रहने के बजाय, राज्य को मूल अधिकारों पर सीधे प्रतिबंध लगाने की इजाजत दी गई है। वस्तुतः परिणाम एक ही निकलता है। एक जिसे प्रत्यक्षतः करता है दूसरा उसे अप्रत्यक्ष रुप से करता है। दोनों ही दशाओं में मूल अधिकार पूर्ण नहीं है।