प्रारुप संविधान का प्रथम वाचन - Page 81

62 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

प्रारुप संविधान में मूल अधिकारों के बाद निर्देशक तत्व दिए गए हैं। संसदीय लोकतंत्र के लिए रचित संविधान की यह एक नई विशेषता है। संसदीय लोकतंत्र का एकमात्र संविधान जिसमें ऐसे सिद्धांत लेखबद्ध हैं, वह आयरिश स्वतंत्र राज्य का संविधान है। इन निर्देशक तत्वों को भी आलोचना का शिकार होना पड़ा है। कहा जाता है कि वह केवल पवित्र घोषणाएं हैं। उनमें कोई बाध्यकारी बल नहीं है। इसमें कोई शक नहीं है कि यह आलोचना निरर्थक है। स्वयं संविधान में ऐसा साफ-साफ शब्दों कहा गया है।

कहा जाता है कि निदेशक तत्वों के पीछे कोई कानूनी बल नहीं है। मैं यह मानने के लिए तैयार हूँ। लेकिन मैं यह मानने के लिए तैयार नहीं हूँ कि उनमें कतई बाध्यकार बल नहीं है और न ही मैं यह मानने को तैयार हूँ कि वे इसलिए निरर्थक हैं क्योंकि कानून की नजर में कोई बाध्यकारी बल नहीं है।

‘‘निर्देशक तत्व इन्स्ट्रमेन्ट ऑफ इन्सट्रक्शन’’ की तरह हैं जो भारत शासन अधिनियम, 1935 के अधीन ब्रिटिश सरकार द्वारा अपने उपनिवेशों तथा भारत के गर्वनर जनरल तथा उपनिवेशों के गर्वनरों को जारी किए गए थे। प्रारुप संविधान के अंतर्गत ऐसे अनुदेश राष्ट्रपति और राज्यपालों को जारी किया जाना प्रस्तावित है। इस अनुदेश पत्र का पाठ संविधान की अनुसूची 4 में मिलेगा जिन्हें ‘‘निर्देशक तत्व’’ कहा जाता है वह अनुदेश पत्र का दूसरा नाम है। एकमात्र अंतर यह है कि विधायिका और कार्यपालिका के लिए अनुदेश है। मेरे विचार में, इसका स्वागत किया जाना चाहिए। जहाँ कहीं शान्ति, व्यवस्था और सुशासन के लिए व्यापक शक्ति दी जाती है वहाँ यह आवश्यक है कि उसके साथ-साथ उसके प्रयोग को विनियमित करने वाले अनुदेश भी दिए जाएं।

संविधान में ऐसे अनुदेशों का समावेश जैसे प्रारुप में प्रस्तावित है, एक अन्य कारण से भी औचित्यपूर्ण है। जिस रुप में प्रारुप संविधान तैयार किया गया है उसमें देश के शासन के लिए केवल तंत्र की व्यवस्था की गई है। यह किसी खास बल को सत्तारुढ़ करने का उपाय नहीं है जैसा कि कुछ देशों में किया गया है। यदि व्यवस्था को लोकतंत्र की कसौटी पर खरा उतरना है तो यह जनता पर छोड़ दिया जाए कि वह किसे चुनकर सत्ता में लाए। लेकिन जो भी सत्ता में आएगा वह अपनी मर्जी से कुछ भी करने के लिए स्वतंत्र नहीं होगा। उसका प्रयोग करने के लिए उसे ‘‘निर्देशक तत्व’’ नामक अनुदेशों का आदर करना होगा। वह उनकी उपेक्षा नहीं कर सकता। हो सकता है उसे उनके उल्लंघन के लिए न्यायालय में जवाबदेह न होना पड़े। लेकिन उनके लिए उसे चुनाव के समय मतदाता के सामने निश्चय ही जवाब देना होगा। इन निर्देशक तत्वों का क्या मूल्य है यह उस समय ज्यादा समझ में आएगा जब ताकतें (साधिकार) सत्ता हथियाने के उपाय करेंगी।

इनका कोई बाध्यकारी बल नहीं है, यह उनके संविधान में शामिल किए जाने के