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खिलाफ कोई तर्क नहीं है। संविधान में उन्हें कहाँ रखा जाए इस बारे में मतभेद हो सकता है। मैं सहमत हूँं कि यह कुछ विचित्र बात है कि ये उपबंध, जिसकी बाध्यताएं सकारात्मक नहीं हैं, उन उपबंधों के बीचोबीच रखी जाएँ जो सकारात्मक तौर पर बाध्यकारी हैं। मेरे निर्णय में, उनका उचित स्थान अनुसूची-3क और 4 है जिनमें राष्ट्रपति और राज्यपालों के लिए ‘‘अनुदेश पत्र’’ अंकित है। जैसा कि मैंने कहा था, वे कार्यपालिका और विधानमंडलों के लिए वास्तव में अनुदेश पत्र हैं उन्हें अपनी शक्तियों का प्रयोग किस प्रकार करना चाहिए। लेकिन यह केवल व्यवस्था के लिए है।
कुछ आलोचकों का कहना है कि केन्द्र बहुत मजबूत है। दूसरों का कहना है कि इसे और मजबूत बनाया जाए। प्रारुप संविधान में संतुलन रखा गया है। आप केन्द्र को कितना भी शक्तियों से वंचित रखें पर शक्तियों का केन्द्रीयकरण अपरिहार्य है। हमें संयुक्त राज्य अमेरिका में फेडरल सरकार के विकास पर विचार करके देखना होगा। हालांकि संविधान ने उसे बहुत सीमित शक्तियां दी थीं फिर भी वह पहले से ज्यादा शक्तिशाली बन गया है और उन पर अंकुश रखता है। ऐसा आधुनिक अवस्थाओं के कारण है। निस्संदेह वही अवस्थाएं भारत सरकार के सामने आएंगी और उसे मजबूत होने से कोई नहीं रोक सकता। दूसरी ओर, हमें इसे और मजबूत बनाने की प्रवृति का प्रतिरोध करना चाहिए। वह जितना हजम कर सकता है उससे ज्यादा ग्रहण न करें। उसकी शक्ति उसके वजन के अनुरूप होनी चाहिए। उसे इतना मजबूत बनाना मूर्खतापूर्ण होगा कि वह अपने ही वजन से धराशायी हो जाए।
प्रारुप संविधान की आलोचना इस कारण की जाती है कि इसमें केन्द्र और प्रान्तों के सांविधानिक संबंध एक प्रकार के हैं तथा केन्द्र और देशी रियासतों के सांविधानिक संबंध दूसरे प्रकार के हैं। देशी रियासतें संघ सूची में शामिल विषयों की पूरी सूची स्वीकार करने के लिए बाध्य नहीं हैं बल्कि उन्हीं के लिए हैं जो प्रतिरक्षा, विदेश कार्य और संचार के अंदर आते हैं। वे समवर्ती सूची में शामिल विषयों को स्वीकार करने के लिए बाध्य नहीं हैं। वे प्रारुप संविधान में अंकित राज्य सूची के विषयों को स्वीकार करने के लिए भी बाध्य नहीं हैं। वे अपनी निजी संविधान सभा बनाने और अपने संविधान बनाने के लिए स्वतंत्र हैं, निस्संदेह यह सबसे बड़ा दुर्भाग्यपूर्ण है और मेरा निवेदन है कि इसका कोई परित्राण नहीं है। यह विषमता राज्य दक्षता के लिए खतरनाक भी साबित हो सकती है। जब तक विषमता रहेगी अखिल भारतीय विषयों पर केन्द्र का प्राधिकार हल्का पड़ सकता है। क्योंकि वह शक्ति शक्ति नहीं जो सभी मामलों में और सभी स्थानों पर इस्तेमाल न की जा सके। जैसे युद्ध से उत्पन्न स्थिति में कुछ क्षेत्रों में महत्वपूर्ण शक्तियों के प्रयोग पर ऐसी सीमाएं राज्य के संपूर्ण जीवन को पूर्णतः संकटग्रस्त कर सकती हैं। इससे भी बुरी बात यह है कि प्रारुप संविधान के अंतर्गत देशी रियासतों को अपनी स्वयं की सेनाएं