प्रारुप संविधान का प्रथम वाचन - Page 84

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का परिणाम नहीं था इसलिए किसी भी राज्य को उससे विलग होने का अधिकार नहीं है। फेडरेशन एक यूनियन है क्योंकि यह अखंड है। यद्यपि देश और लोग प्रशासन की सुविधा की दृष्टि से विभिन्न राज्यों में विभक्त हो सकते हैं फिर भी देश एक अखण्ड सम्पूर्ण इकाई है, उसके लोग एक ही स्रोत से प्राप्त एक ही शक्ति के अधीन रहने वाले एक ही लोग है। अमरीकियों को यह सिद्ध करने के लिए गृह युद्ध छोड़ना पड़ा था कि राज्यों को विलग होने का कोई अधिकार नहीं है और यह कि उनका फेडरेशन अखंड है। प्रारुपण समिति ने सोचा कि इस विषय को अटल या विवाद के लिए छोड़ देने के बजाय शुरु में ही इसे स्पष्ट करना बेहतर है।

संविधान संशोधन विषयक उपबंधों पर प्रारुप संविधान के आलोचकों ने तीव्र प्रहार किए हैं। कहा गया है कि प्रारुप में समाविष्ट उपबंध संशोधन करना कठिन बनाते हैं। प्रस्ताव है कि संविधान का संशोधन कम से कम कुछ वर्षों तक साधारण बहुमत से हो जाना चाहिए। यह तर्क प्रखर और विलक्षण है। कहा जाता है कि इस संविधान सभा का चुनाव प्रौढ़ मताधिकार के आधार पर होगा और फिर भी संविधान सभा को साधारण बहुमत से संविधान पारित करने का अधिकार दिया गया है जबकि संसद को यह अधिकार नहीं दिया गया है। इसे प्रारुप संविधान के बेतुके कथनों में से एक बताया गया है। मुझे इस आरोप का खंडन करना होगा क्योंकि इसका कोई आधार नहीं है। संविधान संशोधन के विषय में प्रारुप संविधान के उपबंध कितने सरल हैं यह जानने के लिए अमरीकी और आस्ट्रेलियाई संविधानों में दिए गए संशोधन विषयक उपबंधों का अध्ययन मात्र करना होगा। उनकी तुलना में, प्रारुप संविधान में दिए गए उपबंध सबसे सरल दिखाई पड़ेंगे। प्रारुप संविधान में विस्तृत और जटिल प्रक्रिया को हटा दिया गया है जैसे कनवेंशन या जनमत द्वारा फैसला। संशोधन की शक्ति केन्द्रीय और प्रांतीय विधानमंडलों को दी गई है। कुछ खास विषयों की बाबत ही और ये बहुत थोड़े से हैं, राज्य विधानमंडलों का अनुसमर्थन अपेक्षित है। संविधान के अन्य सब उपबंधों के संशोधन का काम संसद को सौंपा गया है। केवल एक प्रतिबंध लगाया गया है और वह यह है कि प्रत्येक सदन के उपस्थित और मतदान करने वाले कम से कम दो तिहाई सदस्यों द्वारा और प्रत्येक सदन की कुल सदस्य संख्या के बहुमत से ही संविधान संशोधन पारित किया जा सकता है। संविधान का संशोधन करने का इससे सरल ढंग सोचना दुष्कर है।

जिसे संशोधन उपबंधों का बेतुकापन कहा जाता है वह संविधान सभा तथा संविधान के अनुसार निर्वचित भावी संसद की स्थिति की गलत अबधारण पर आधारित है। संविधान सभा का संविधान निर्माण में कोई पक्षपातपूर्ण हेतु नहीं हैं। एक अच्छा और उपयोगी (व्यवहार्य) संविधान सुलभ कराने के अलावा इसे कुछ नहीं करना है। संविधान के अनुच्छेदों पर विचार करते समय इसकी दृष्टि किसी खास उपाय (कानून) का पारित कराना नहीं है। यदि भावी संसद संविधान सभा के रुप में बुलाई गई तो उसके सदस्य