66 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
अपने दलगत उपायों को पारित करना सुकर बनाने के लिए जिन्हें वे संविधान के किसी अनुच्छेद के कारण जो उनके रास्ते में बाधक बना है, संविधान का संशोधन करने की मांग पक्षकार के रुप में करेंगे। इस प्रकार संसद को अपना मतलब निकालना होगा जबकि संविधान सभा का कोई मतलब नहीं है। संविधान सभा और भावी संसद में यही अंतर है। इससे जाहिर होता है कि सीमित मताधिकार पर निर्वाचित होते हुए भी संविधान सभा पर साधारण बहुमत से संविधान पारित करने का विश्वास क्यों किया जा सकता है और प्रौढ़ मताधिकार पर निर्वाचित होने पर भी संसद पर उसका संशोधन करने की वैसी ही शक्ति के साथ विश्वास क्यों नहीं किया जा सकता।
मुझे विश्वास है कि मैं प्रारुपण समिति द्वारा निर्धारित प्रारुप संविधान के खिलाफ की गई कटु आलोचनाओं पर अपनी बात कह चुका हूँ। मेरे विचार में पिछले आठ महीनों के दौरान जब यह संविधान जनता के समक्ष रहा है, इसके बारे में की गई कोई भी महत्वपूर्ण टिप्पणी या आलोचना शेष नहीं रही है। अब यह निश्चय करना संविधान सभा का अधिकार है कि वह प्रारुपण समिति द्वारा निर्धारित संविधान को स्वीकार करे या उसे पारित करने से पहले उसमें कोई परिवर्तन करे।
फिर भी मैं यह कहना चाहूँगा। संविधान पर भारत की कुछ प्रांतीय विधानसभाओं में भी चर्चा की गई है। बम्बई, मध्य प्रांत, पश्चिम बंगाल, बिहार, मद्रास और पूर्वी पंजाब में चर्चा हुई थी। यह सच है कि कुछ प्रांतीय विधानसभाओं में संविधान के वित्तीय उपबंधों पर तथा मद्रास में अनुच्छेद 226 पर गंभीर आपत्तियां की गई थीं। लेकिन इसके सिवाय, किसी भी अन्य प्रांतीय विधानसभा में संविधान अनुच्छेदों पर कोई गंभीर आपत्ति पेश नहीं हुई। कोई भी संविधान परिपूर्ण नहीं है। प्रारुपण समिति स्वयं प्रारुप संविधान में सुधार के लिए कुछ संशोधन सुझा रही है। लेकिन प्रांतीय विधानसभाओं में जो बहस हुई है उससे मुझे यह कहने का प्रोत्साहन मिला है कि प्रारुपण समिति द्वारा निर्धारित संविधान इस देश का शुभारंभ करने के लिए काफी अच्छा है। मैं यह महसूस करता हूँ कि यह चलने योग्य है। यह लचीला है और यह देश को शांतिकाल और युद्धकाल दोनों में एकजुट रखने के लिए काफी मजबूत है। यदि मुझे ऐसा करने की इजाजत है तो, वास्तव में यदि एक संविधान के अंतर्गत काम सुचारु रूप से नहीं चला तो इसका कारण यह नहीं होगा कि हमारा संविधान खराब है। हमारा कहना यही होगा कि आदमी निकम्मा था। श्रीमान्, मैं पेश करता हूँ।
¹डॉ. अम्बेडकर के भाषण के बाद संविधान सभा के सदस्यों ने खड़े होकर प्रारुप संविधान के बारे में अपने-अपने विचार प्रकट किए। यहाँ डॉ. अम्बेडकर और प्रारुपण समिति की प्रशंसा में कुछ अंश उद्धृत हैं-संपादकह्
* श्री फ्रेंक एंथनी (मध्य प्रांत और बरार साधारणः- सभापति महोदय, यद्यपि