68 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
है। जैसा कि डॉ. अम्बेडकर ने कहा है, इस विषय में हमने बहुत सुन्दर मध्यमार्ग खोज लिया है। अल्पसंख्यक वर्ग भी इसमें सहायक रहे हैं।
अंत में श्रीमान्, मैं यह कहना चाहता हूँ कि हमारा उस पूर्ण ऊंचाई तक पहुंचना मुद्रित संविधान में अंकित शब्दों पर अंततः उतना निर्भर नहीं करेगा जितना उस भावना पर जिससे देश के नेता और प्रशासक हमारे संविधान को कार्यरुप देंगे और उस भावना पर, जिससे वे हमारे सामने आने वाली समस्याओं से निपटेंगे, जिस ढंग से हम इस संविधान की भावना का निर्वाह करेंगे उसी पर हमारे आदशों की प्राप्ति निर्भर करेगी जिनमें हम सबकी आस्था है।
[*] श्री कृष्ण चन्द्र शर्मा (संयुक्त प्रांतः साधारण)ः मैं भी डॉ. अम्बेडकर का अभिनंदन करने के आनंद में भाग लेना चाहता हूँ। वह सदन के समक्ष सुन्दर स्कीम रखने के लिए कठोर परिश्रम के लिए और अपने विद्वतापूर्ण एवं पटुतापूर्ण भाषण के लिए बधाई के पात्र हैं।
श्रीमान्, संविधान पर विचार करते समय हमें एक बात ध्यान में रखनी होगी कि संविधान अपने आप में एक साध्य नहीं है। संविधान का निर्माण कुछ उद्देश्यों के लिए किया जाता है और वे उद्देश्य होते हैं जनता की व्यापक भलाई, राज्य की स्थिरता और व्यक्ति की प्रगति और विकास। भारत में जब हम व्यक्ति की प्रगति और विकास की बात कहते हैं तो हमारा अभिप्राय हैं उसकी आत्मानुभूति, आत्म विकास और आत्मतुष्टि। जब हम लोगों का विकास कहते हैं तो हमारा अभिप्राय है एक मजबूत और अखंड राष्ट्र।
ऽऽऽऽऽ
[**] श्री टी.टी.कृष्णमाचारी (मद्रासः साधारण)ः सभापति महोदय, मैं सदन में उनसे से एक हूँ जिन्होंने डॉ. अम्बेडकर को बड़े ध्यान से सुना है। मुझे ज्ञात है कि इस संविधान के प्रारुपण के काम में उन्होंने कितना श्रम किया है और कितना उत्साह दिखाया है। साथ ही मैं यह भी महसूस करता हूँ कि प्रारुपण समिति ने इस पर उतना ध्यान नहीं दिया जितना इस समय हमारे लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण संविधान के प्रारुपण के प्रयोजन के लिए आवश्यक था। कदाचित सदन को मालूम है कि आप द्वारा मनोनीत सात सदस्यों में से एक ने सदन से त्यागपत्र दे दिया है और उसके स्थान पर कोई नहीं लिया गया है। एक अमेरिका में था और उसका स्थान नहीं भरा गया तथा एक अन्य व्यक्ति राज्य के कार्यों में व्यस्त था और इस तरह उसकी जगह खाली थी एक या दो लोग दिल्ली से बहुत दूर थे। कदाचित स्वास्थ्य की वजह से वे इसमें भाग नहीं ले सके। इस प्रकार अन्ततः हुआ यह कि इस संविधान के प्रारुपण का भार डॉ. अम्बेडकर पर *** . संविधान सभा वाद-विवाद, शासकीय रिपोर्ट, 8, 5 नवंबर, 1948, पृष्ठ 229।वही, पृष्ठ 231-32 ।