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उनके प्रस्ताव का समर्थन करता हूँ...।
ख्5, डॉ. पी. एस. देशमुख (मध्य प्रांत और बरारः साधारण)ः श्रीमान्, मैं आपका आभारी हूँ कि आपने मुझे प्रस्तावित संविधान के विषय में अपने विचार रखने का मौका दिया है। समय सीमित है। अतः मेरे विचार बहुत साधारण प्रकार के ही हो सकते हैं। जब विभिन्न खंडों पर विचार होगा तो मैं दुर्भाग्यवश यहाँ उपस्थित नहीं रहूँगा। इसलिए मैं ये कुछ मिनट दिए जाने के लिए आपको विशेष रुप से कृतज्ञ हूँ।
मेरे माननीय मित्र डॉ. अम्बेडकर का भाषण विलक्षण था और वह पेश किए गए प्रारुप संविधान पर एक प्रभावशाली टीका थी। जैसा कि सुविदित है, यह ख्यातिलब्ध अधिवक्ता हैं और मेरे विचार में उन्होंने अपना पक्ष बड़ी योग्यता से प्रस्तुत किया है। यदि उनके पास समय होगा तो वह कदाचित संविधान को एक भिन्न आकार देते। जो भी हो, उन्होंने यह कहकर अपनी कठिनाइयाँ पूरी तरह मान ली हैं कि आखिर आप प्रशासन को एक दिन में तो नहीं बदल सकते और यदि वर्तमान संविधान का वर्णन सारांश में किया जा सकता है तो यह वर्तमान प्रशासन के अनुरूप होना आशायित है....।
ख्6, श्री एस. नागप्पा उपसभापति महोदय, पूर्व वक्ताओं की भांति मैं भी प्रारुप समिति के माननीय अध्यक्ष और उसके सदस्यों को बधाई देता हूँ। उन्होंने इस बात का ध्यान रखा है कि सभी समस्याओं के सभी पहलुओं और विभिन्न समितियों की सभी रिपोर्टों को समेकित किया जाए और उस पर विचार किया जाए।
श्रीमान्, मैं उन लोगों में से एक हूँ जो एक मजबूत केन्द्र की वकालत करते हैं विशेषकर इसलिए जैसा कि हम सब जानते हैं, कि हमने अभी हाल ही में अपनी आजादी हासिल की है। हमें उसे संचित करके और आने वाले अनंत समय के लिए संजोकर रखने के लिए काफी समय चाहिए। केन्द्र मजबूत हो, इसका और भी कारण है। हम अनेक दृष्टियों से साम्प्रदायिक रुप से तथा धार्मिक आधारों पर पहले बंट चुके हैं। अब हम प्रांतों के आधार पर विभक्त न हों। इसलिए सब प्रांतों को एकजुट करने के लिए एवं और अधिक एकता लाने के लिए मजबूत केन्द्र का होना समग्र देश के हित में है।
केन्द्र क्यों मजबूत होना चाहिए, इसका एक अन्य कारण मैं अभी बताऊँगा। कुछ लोगों का कहना है कि हमें योद्धावाली मानसिकता के साथ मजबूत केन्द्र चाहिए। मैं यह नहीं समझता कि हमें ऐसी कोई मानसिकता चाहिए। हमें अहिंसा और सत्य का पाठ पढ़ाया गया है। ये हमारे सिद्धांत हैं। ऐसी हालत में, केन्द्र की योद्धावाली मानसिकता होने की कोई संभावना नहीं है।
5 6 सी.ए.डी. 11, नवंबर, 1948, पृष्ठ 250 ।वही, पृष्ठ 252 ।