72 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
माननीय डॉ. अम्बेडकर ने अपनी रिपोर्ट और प्रारुप संविधान पेश करते हुए कहा था कि संविधान का ढांचा परिसंघीय है लेकिन उसका स्वरुप एकात्मक है। मेरा मानना है श्रीमन्, विशेषकर इस हालत में हमें ऐसा ही संविधान चाहिए। हमें बताया गया था कि उन्होंने भारत शासन अधिनियम से वह लिया है जब हम उसमें कोई अच्छी चीज पाते हैं तो हम उसकी नकल करते हैं यदि हमें दूसरे संविधानों में हमारे लिए, हमारी प्रथाओं और हमारी संस्कृति के लिए कोई उपयोगी और उपयुक्त चीज मिलती है तो उसे अंगीकार करने में कोई नुकसान नहीं है। संविधान में अल्पसंख्यकों के लिए काफी अच्छे उपबंध किए गए हैं। मैं इससे खुश हूँ और जो प्रतिनिधि अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा करने के लिए इस सदन में आए हैं वे भी इस पर खुश हैं। इसके लिए हमें अल्पसंख्यक समुदाय को बधाई देनी होगी। हमें अल्पसंख्यकों को कुछ विशेषाधिकार के लिए राजी होने के लिए बहुसंख्यक समुदाय को बधाई देनी होगी....।
श्रीमन्, मैं एक बार फिर माननीय डॉ. अम्बेडकर को धन्यवाद देता हूँ कि उन्होंने इस संविधान के प्रारुपण में काफी परिश्रम किया है। निस्संदेह यह एक बड़ा काम है पर उन्होंने उसे कामयाबी के साथ और थोड़े समय में ही कर दिया है।
[♠] श्री अरुण चन्द्र गुहा (पश्चिमी बंगाल-साधारण)ः उपसभापति महोदय, अब प्रारुप संविधान पर आते हैं। मुझे खेद है कि प्रारुपण समिति अपने कार्यक्षेत्र के बाहर आ गई है। मुझे खेद है कि जो संविधान हमारे सामने रखा गया है वह संविधान सभा द्वारा निर्धारित सिद्धांतों का अतिक्रमण करता है। पूरे संविधान में हमें कांग्रेसी विचारधारा की, गांधीवादी सामाजिक एवं राजनीतिक विचारधारा की कोई झलक नहीं दिखाई पड़ती। विद्वान डॉ. अम्बेडकर को अपने लम्बे और विद्वतापूर्ण भाषण में कहीं भी गांधी जी या कांग्रेस का जिक्र करने का मौका नहीं मिला। इसमें कोई आश्चर्य नहीं है क्योंकि सम्पूर्ण संविधान में कांग्रेसी आदर्श और कांग्रेसी विचारधारा का अभाव है, विशेषकर तब जब हम एक संविधान की रचना करने जा रहे हैं, यह जो निर्माण करने जा रहे हैं वह केवल राजनीतिक संरचना नहीं है, यह केवल एक प्रशासन तंत्र नहीं है जिसकी स्थापना हम करने जा रहे हैं। यह राष्ट्र के सामाजिक और आर्थिक भविष्य की मशीनरी है....।
जहां तक मूल अधिकारों का संबंध है डॉ. अम्बेडकर ने अपने प्रस्ताव भाषण में एक प्रकार की आध्यात्मिक बहस शुरु कर दी है। डॉ. अम्बेडकर एक विद्धान प्रोफेसर हैं और मैं उनकी विद्वता एवं योग्यता को मानता हूँ और मेरे विचार में प्रारुप संविधान मुख्यतः उनका ही कला-कौशल है। उन्होंने एक नया शब्द रखा है। श्रीमन्, मैं यह महसूस करता हूँ कि विश्व में ऐसा कोई अधिकार नहीं है जो पूर्ण हो। हर अधिकार के साथ कुछ बाध्यता होती है। बाध्यता के बिना कोई अधिकार नहीं हो सकता....।
♠ . संविधान सभा वाद-विवाद, शासकीय रिपोर्ट, 7, 4 नवंबर, 1948, पृष्ठ 225-256 ।