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उपसभापति (डॉ. एच. सी. मुखर्जी)ः इससे पहले मैं सदन में बोलने के लिए अगले सदस्य को आमंत्रित करुँ मैं यह बता दूं कि मेरे पास 40 सदस्यों की पर्चियाँ हैं जो बोलना चाहते हैं। वह विषय इतना तात्कालिक एवं महत्वपूर्ण है कि मैं चाहता हूँ कि हरेक को प्रारुप से विधान पर अपने विचार व्यक्त करने का मौका मिले। इसलिए वक्तओं से मेरा अनुरोध है कि 10 मिनट की समय-सीमा जो मैंने नियत की है उसे पार न करें।
ख्1, श्री टी. प्रकाशम् (मद्रास-साधारण)ः श्रीमन्, डॉ. अम्बेडकर माननीय प्रभारी सदस्य ने जो प्रारुप संविधान पेश किया है वह बहुत बड़ा दस्तावेज है। उन्होंने और उनके अन्य साथियों ने जो परिश्रम किया है वह वास्तव में बहुत बड़ा है। मेरे माननीय मित्र श्री टी.टी. कृष्णमाचारी ने बोलते हुए उस कठिनाई के बारे में बताया था जिससे माननीय डॉ. अम्बेडकर जूझ रहे थे क्योंकि समिति के 5-6 सदस्यों ने समिति से त्यागपत्र दे दिया था और उनकी जगह नए सदस्य मनोनीत नहीं किए गए थे...।
ऽऽऽऽऽ
डॉ. जोसफ अल्वान डिसूजा (बम्बई-साधारण)ः उपसभापति जी, इस महान देश के इतिहास के पन्नों में जो हजारों वर्ष पुराना है, और संभवतः हमेशा रहेगा। जरुरत है उसे वह सब कुछ देने की जो उसे देय है, निश्छल और ईमानदारी से आत्म निरीक्षण करने की, भाईचारे और सहयोग की भावना की, जिसके परिणामस्वरुप शांति, सौहार्द और सद्भाव व्यष्टि और समष्टि के रुप में हमारे विविध अस्तित्वों के जीवन-लक्ष्य होंगे, पर्याप्त विस्तृत दृष्टि अपनाने की, ताकि वे जटिल और कठिन समस्याएं जो इस सांविधानिक स्थापना के संबंध में हमारे सामने आनी हैं, प्रधानतः संपूर्ण देश की सम्पन्नता और तरक्की के विस्तृत पहल से जांची परखी जा सकें और अन्ततः ‘‘पड़ोसी से भी वैसा ही प्यार कीजिए जैसा अपने आपसे’’ नामक सुविदित उक्ति के पर्याप्त उदार और परमार्थ परक प्रदर्शन की ताकि समग्र राष्ट्र के उच्च हितों में, भावनात्मक संवेगात्मक, संकीर्ण दलबंदी सम्पूर्ण राष्ट्रसंबंधी मूलभूत नीति के फैसलों पर अनुचित असर डाल पाए।
अनेक सदस्यों ने खासकर उन सदस्यों ने जिन्होंने अपने वक्तव्य दिए हैं, यह मान लिया है कि प्रारुप संविधान एक श्रेष्ठ कृति है। यदि इजाजत हो तो मैं इसे माननीय डॉ. अम्बेडकर और उनकी प्रारुपण समिति के महीनों की श्रमसाध्य स्मरणीय कृति कहूँगा। हम इस कृति को निश्चित रुप से विशेषज्ञों की कृति कह सकते हैं, यह कृति आद्योपान्त तुलनात्मक, चयनात्मक और दक्षात्मक स्वरुप की है....।
ख्2, माननीय श्री के. संथानमः प्रारुपण समिति ने उत्तम काम किया है, लेकिन
1 . संविधान सभा वाद-विवाद, शासकीय रिपोर्ट, 7, 5 नवंबर, 1948, पृष्ठ 257 ।