76 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
147 अनुच्छेद हैं, कामनवेल्थ ऑफ आस्ट्रेलिया एक्ट में 128 अनुच्छेद हैं, यूनियन ऑफ साउथ अफ्रीका एक्ट में 153 अनुच्छेद हैं, यू.एस.एस.आर. कांस्टीट्यूशन में 146 अनुच्छेद हैं, स्विस फेडरल कांस्टीट्यूशन में 123 अनुच्छेद हैं, जर्मन रीच कांस्टीट्यूशन में 181 अनुच्छेद हैं और जापानीज कांस्टीट्यूशन में 103 अनुच्छेद हैं। इन संविधानों पर दृष्टिपात करने से ही पता चल जाता है कि इनमें से किसी में भी 200 अनुच्छेद से ज्यादा नहीं हैं जबकि हमारे संविधान में 315 अनुच्छेद हैं।
आलोचकों ने हमारे संविधान के भारी होने पर काफी हंगामा किया है। लेकिन हमें नहीं भूलना चाहिए कि हमारा देश 33 करोड़ जनसंख्या वाला एक विशाल देश है और हम प्रायः मानवजाति के पांचवे हिस्से के लिए संविधान बना रहे हैं। इसलिए हमारे संविधान के भारी होने पर कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए....।
श्रीमन्, हमारा देश ऐसा है कि जिसकी अपनी समस्याएं हैं। विश्व में किसी भी देश में रियासतें नहीं हैं और कोई आश्चर्य नहीं है कि इन सब विविध संघटकों को वर्तमान लोकतांत्रिक सिद्धांतों के अनुरुप बनाने के लिए हमारे संविधान के प्रारुपकार वह सब कुछ अनुच्छेदों में समाहित नहीं कर सके हैं जो वे अपनाना चाहते थे। अतः हमारे संविधान के भारी होने का जो आरोप लगाया गया है वह मुझे निरर्थक प्रतीत होता है.....।
पं. ठाकुर दास भार्गव (पूर्वी पंजाब-साधारण)ः ........मेरे मित्रों का आग्रह है कि मैं अंग्रेजी में बोलूँ। इसलिए मैं उनकी इच्छा के सामने नतमस्तक हूँ। यह सच है कि मैं अपने आपको हिन्दी में अधिक सरलता से व्यक्त कर सकता हूँ किन्तु साथ ही मेरी यह भी इच्छा है कि मैं सदन के सभी सदस्यों द्वारा समझा जाऊॅं।
श्रीमन्, मैं चाहता हूँ कि प्रारुपण समिति पर इस सदन में की गई प्रशंसा की वर्षा में मैं भी भाग लूँ लेकिन अपने निजी विचारों के बिना मैं ऐसा नहीं कर सकता। जब मैं कुछ मित्रों द्वारा की गई शिकायतों को ध्यान में रखता हूँ तो मैं यह महसूस करता हूँ कि प्रारुपण समिति ने कुछ भी नहीं किया है जो उससे प्रत्याशित था। कुछ सदस्य अनुपस्थित थे। कुछ ने भाग नहीं लिया, कुछ ने पूरे मन से काम नहीं किया.... यह संविधान भारत की असली आत्मा का प्रतिनिधित्व नहीं करता। गांवों की स्वायत्ता को यहाँ पूरी तरह उजागर नहीं किया गया और यह कैमरा (प्रारुप संविधान हाथ में लिए हुए) उस भारत की सच्ची तस्वीर नहीं दे सकता जो अनेक लोक देखना चाहेंगे। प्रारुपण समिति के पास गांधी जी का मन नहीं था, उन लोगों का मन नहीं था जो सोचते हैं इस कैमरे के जरिए भारत के कोटि-कोटि लोगों की झलक मिलनी चाहिए। फिर भी, श्रीमन्, मैं इस श्रम, उद्यम और योग्यता की सराहना किए बिना नहीं रह सकता जिसके साथ डॉ. अम्बेडकर ने इस संविधान पर काम किया है। मैं उनके भाषण पर उन्हें बधाई देता हूँ हालांकि यह जरुरी नहीं है कि मैं उनके द्वारा इस सदन के सामने व्यक्त की गई भावनाओं से सहमत होऊँ।
श्रीमन्, मेरे विचार में, इस संविधान की आत्मा इसकी उद्देशिका में निहित है और उद्देशिका में ‘‘बंधुता’’ शब्द जोड़ने के लिए डॉ. अम्बेडकर के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन करते