प्रारुप संविधान का प्रथम वाचन - Page 96

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हुए मुझे खुशी है। अब श्रीमन्, मैं इस उद्देशिका के मापदंड को सम्पूर्ण संविधान पर लागू करना चाहता हूँ। यदि न्याय, स्वतंत्रता, समता और बंधुता इस संविधान में सुलभ हैं तो हम इस आदर्श को इस संविधान के माध्यम से ही प्राप्त कर सकते हैं।

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ख्1, प्रो. शिब्बन लाल सक्सेना (संयुक्त प्रांत-साधारण)ः उपसभापति महोदय, आज हमें अपने प्रारुप संविधान में अन्तर्निहित सिद्धांतों की चर्चा करनी है। शुरु-शुरु में, मुझे विद्वान डॉक्टर को बधाई देनी है जिन्होंने यह प्रस्ताव हमारे सम्मुख रखा है। उनका भाषण मैंने कई बार पढ़ा है और मेरे विचार में उनका भाषण हमारे संविधान की सुस्पष्ट अभिव्यक्ति का सर्वोत्कृष्ट नमूना है। निश्चय ही मैं समझ सकता हूँ कि प्रारुप संविधान की इससे बेहतर वकालत नहीं हो सकती थी....।

अ...अंत में श्रीमन्, मैं प्रारुपण समिति को उत्तम संविधान के लिए धन्यवाद देता हूँॅ। मैं यह भी महसूस करता हूँ कि जो सुझाव मैंने दिए हैं उन पर संशोधन के चरण में चर्चा की जाएगी और अन्ततः उन्हें हमारे देश के संविधान में जगह मिलेगी। श्रीमन्, इन शब्दों के साथ, मैं सदन में रखे गए प्रस्ताव की प्रशंसा करता हूँ।

ख्2, श्री शारंगधर दास (उड़ीसा राज्य)ः उपसभापति महोदय, पूर्व सभी वक्ताओं की भांति मैं भी प्रारुपण समिति को विशेषकर उसके अध्यक्ष डॉ. अम्बेडकर को उनके कठोर श्रम के लिए बधाई देता हूँ किन्तु उनके भाषण में कुछ ऐसी चीजें हैं जिनसे मैं सहमत नहीं हो सकता.....

3 श्री आर. आर. दिवाकर (बम्बई-साधारण)ः उपसभापति महोदय मेरे पूर्व माननीय वक्ताओं ने काफी कुछ कह दिया है और मुझे उसी बात को दोहराकर सदन का बहुत समय नहीं लेना चाहिए। मैं कुछ बातें कहना चाहूँगा। मेरे दृष्टिकोण से ये बातें आज बहुत महत्व रखती हैं जब हम अपने देश को एक नया संविधान देने वाले हैं एक बात मैं स्पष्ट करना चाहूँॅंगा और वह यह है कि जो प्रारुप संविधान हमारे समक्ष है वह वस्तुतः एक स्मरणीय कृति है और हम उसके लिए प्रारुपण समिति और उसके अध्यक्ष को पहले ही बधाई दे चुके हैं जो इसे सदन के समक्ष पेश कर रहे हैं। साथ ही यह भी कहना चाहूँॅंगा कि प्रारुपण समिति ने केवल संविधान सभा के विनिश्चयों का ही प्रारुप नहीं बनाया है अपितु मेरी विनम्र राय में वह प्रारुपण मात्र से आगे निकल गई है, मैं यह कहना चाहूँगा कि उसने उन विनिश्चयों का पुनर्विलोकन किया है। कुछ विनिश्चयों का पुनरीक्षण किया है और संभवतः कुछ की पुनर्रंचना की है। हो सकता है, परिस्थितियों के अंतर्गत ऐसा करना अपरिहार्य रहा हो लेकिन साथ ही हम संविधान सभा के सदस्यों को इस बात से सजग रहना चाहिए जब

1 . संविधान सभा वाद-विवाद, शासकीय रिपोर्ट, 7, 6 नवंबर, 1948 पृष्ठ 284। 2 वही, पृष्ठ 286

3 वही, पृष्ठ 291

4 वही, पृष्ठ 295