78 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
हम प्रारुप पर विचार करें और जब हम अपने संशोधन देने की बात सोंचें......
ख्4, महबूम अली बेग साहिब बहादुपर (मद्रास-मुस्लिम)ः उपसभापति महोदय, डॉ. अम्बेडकर द्वारा प्रस्तुत विश्लेषण और समीक्षा विलक्षण रुप से स्पष्ट उत्कृष्ट शिक्षाप्रद एवं व्याख्यात्मक है। हो सकता है कोई उनके विचारों से सहमत ना हो लेकिन इस सदन के विचारार्थ अपना प्रस्ताव रखते समय उन्होंने जो वक्तव्य दिया है उस अनुपम कौशल के लिए प्रशंसा किए बिना नहीं रहा जा सकता....
ख्1, श्री जैड. एच. लारी..... उपबंधों का मूल्य आंकने के लिए हमें दो बातें ध्यान में रखनी होंगी-पहली, संकल्प के माननीय प्रस्तुतकर्ता अर्थात् माननीय डॉ. अम्बेडकर द्वारा की गई कुछ स्वीकृतियां और दूसरी स्वाधीनता प्राप्ति के बाद पिछले पन्द्रह महीनों में लोकतंत्र के कार्यान्वयन का हमारा अनुभव। जब सदन ने संकल्प अपनाए थे जो प्रारुप संविधान के आधार स्तंभ हैं जो हमारे सामने इतना अनुभव नहीं था लेकिन अब है। प्रथम स्वीकृति जो माननीय प्रस्तुतकर्ता ने की थी वह उनके ही शब्दों में यह थी ‘‘भारत में लोकतंत्र भारतीय जमीन पर केवल ऊपरी ड्रेसिंग है जो कि अनिवार्यतः अलोकतांत्रिक है....’’ ‘‘प्रशासन के स्वरुप विहित करने के लिए विधानमंडलों पर विश्वास करना बुद्धिमानी नहीं है।’’ ससम्मान मैं कहता हूँ कि वह मुख्यतः सही है।
ख्2, श्री हुसैन इमाम... मुझे कहना होगा कि मुझे प्रारुपण समिति के अध्यक्ष की स्थिति अस्पृहणीय दिखाई पड़ती है। उन पर वामपंथियों ने इसलिए आक्षेप किया है कि उन्होंने सोवियत संविधान की नकल नहीं की है, और दक्षिणपंथियों ने इसलिए आक्षेप किया है कि उन्होंने ग्राम पंचायत को एक इकाई नहीं माना है। क्या मैं यह कह सकता हूँ कि हमारे कुछ मित्रों के मन में भ्रांति का तत्व है। वे चाहते हैं कि संविधान में उन सब बुराइयों के लिए उपबंध किया जाना चाहिए, भारतीय जिनके शिकार हैं। संविधान में रोटी-कपड़े के लिए उपाय नहीं किए जाते हैं। इस संविधान सभा के एक श्रद्धेय सदस्य को शक था कि इस संविधान में उस प्रयोजन के लिए कोई उपबंध नहीं है। श्रीमन, मेरा निवेदन है कि संविधान किसी देश की उन जरुरतों पर आधारित होता है जिनके लिए वह लागू होता है। हमें देखना है कि इस संविधान में वे अनिवार्य चीजें दी जाएं जो हमारी अपनी परिस्थितियों में अनूठी हैं...।
ऽऽऽऽऽ
बेगम एजाज रसूल (संयुक्त प्रांत-मुस्लिमे)ः श्रीमन, मैं माननीय डॉ. अम्बेडकर को प्रारुप संविधान की विशद और सुस्पष्ट व्याख्या के लिए बधाई देती हूँ। उनका
4 1 . संविधान सभा वाद-विवाद, शासकीय रिपोर्ट, 7, 8 नवंबर, 1948 पृष्ठ 298 ।वही, पृष्ठ 295 2 वही, पृष्ठ।