प्रारुप संविधान का प्रथम वाचन - Page 98

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और प्रारुपण समिति का काम कोई आसान काम नहीं था और इसके लिए वे हमारे मुबारकबाद के हकदार हैं।

श्रीमन, संविधान के निर्माण से जुड़े होने पर मैं विशेष गर्व महसूस करती हूँ। मुझे मौके की पाक सार मालूम है। दो सौ वर्ष की गुलामी के बाद भारत ने पराधीनता के अंधेरे से निकलकर आजादी की रोशनी में कदम रखा है और इस ऐतिहासिक मौके पर हम यहां आज हिन्दुस्तान के लिए एक संविधान बनाने के लिए इकट्ठा हुए हैं जो हमारी भावी नियति को संवारेगा और इस विशल उपमहाद्वीप में रहने वाले 30 करोड़ लोगों की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक स्थिति बनाएगा। इसलिए हमें अपनी जिम्मेदारियों के प्रति पूरी तरह जागरुक रहना चाहिए तथा हमें यहां रहने वाले लोगों की जरुरतों, अपेक्षाओं संस्कृति और प्रतिभा के सर्वोत्तम अनुरुप सर्वश्रेष्ठ व्यवस्था स्थापित करने के दृष्टिकोण से इस काम में जुट जाना चाहिए....।

......ग्राम शासन तंत्र के बारे में डॉ. अम्बेडकर की टिप्पणी की काफी आलोचना हुई है। महोदय, मैं उनसे पूरी तरह सहमत हूँ। आधुनिक प्रवृत्ति नागरिक के अधिकारों की दिशा में है क्योंकि कोई निगम निकाय और ग्राम पंचायतें बहुत निरंकुश हो सकती हैं.....।

महोदय, एक औरत के नाते, मुझे इस बात से बहुत तसल्ली है कि लिंग के आधार पर कोई भेदभाव नहीं बरता जाएगा। प्रारुप संविधान में ऐसा उपबंध किया जाना सर्वथा उचित है, और मुझे यकीन है नयी न्यायपालिका में औरतें मौके की बराबरी की आशा कर सकती हैं।

ख्3, डॉ. मनमोहन दास (पश्चिमी बंगाल-साधारण)ः उपसभापति महोदय, जब हमारे योग्य विधि मंत्री और प्रारुपण समिति के अध्यक्ष डॉ. अम्बेडकर ने प्रारुप संविधान सदन के पटल पर रखा था तब से कुछ दिन गुजर चुके हैं। इन कुछ दिनों के दौरान प्रारुप संविधान इस सदन के विभिन्न सदस्यों के हाथों कटु आलोचना का शिकार हुआ है। बहुत थोड़े सदस्यों के सिवाय, जिन्होंने प्रारुप संविधान पारित करने की इस सदन की क्षमता और प्रामाणिकताओं को प्रश्नगत किया था, अन्य सब सदस्यों का मतैक्य रहा है। उन्होंने प्रारुप संविधान के कुछ खंडों कुछ अनुच्छेदों में, कुछ परिवर्तनों में, परिवर्धनों और लोगों के साथ शुरु में ठीक व्यवहार्य संविधान के रुप में स्वीकार कर लिया है। संविधान में हमें एक बहुत विश्वासवर्धक तत्व दिखाई पड़ता है कि अमेरिका संविधान से भिन्न, प्रारुप समिति ने हमें एकल नागरिकता, भारत की नागरिकता प्रदान की है। प्रतिवाद के इन दिनों में जब हर प्रांत अपने पड़ोसी प्रांत की कीमत पर आगे बढ़ना चाहता है,

3 . संविधान सभा वाद-विवाद, शासकीय रिपोर्ट, 7, 5 नवंबर, 1948, पृष्ठ 305 ।