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देता है, जैसा कि आप दोनों अनुसूचियों में देखेंगे। शब्द ‘आदिवासी’ वास्तव में एक सामान्य शब्द है जिसका कोई विशेष कानूनी अर्थ नहीं है, कुछ फ्अछूतोंय् की तरह यह एक सामान्य शब्द है। कोई भी ‘अछूत’ शब्द में किसी को भी शामिल कर सकता है। इसका कोई निश्चित कानूनी अर्थ नहीं है। इसीलिए भारत सरकार अधिनियम, 1935 में, इसकी आवश्यकता महसूस की गई कि शब्द ‘अछूत’ को कुछ कानूनी अर्थ दिया जाए और ऐसा करने का जो एकमात्र सम्भाव्य तरीका था वह उन समुदायों का ब्यौरा देना था जो विभिन्न भागों और विभिन्न क्षेत्रों में स्थानीय लोगों द्वारा अस्पृश्यता की परीक्षा में उत्तीर्ण माने जाते हैं। यही प्रश्न ‘आदिवासी’ के संबंध में उठता है। आदिवासी कौन हैं? और यह प्रश्न प्रासंगिक होगा क्योंकि इस संविधान के द्वारा, हम इन आदिवासियों को विशेष रियायतें, विशेष अधिकार देने जा रहे हैं। यदि इस मामले को कानून की अदालत में ले जाया जाता है तो इसके लिए एक सर्तक परिभाषा होनी चाहिए कि ये आदिवासी कौन हैं, इस उद ् देश्य हेतु, एक दूसरा शब्द ‘अनुसूचित जाति’ ईजाद करना तय किया गया और आदिवासियों का इस शीर्षक के तहत ब्यौरा दिया जाना तय किया गया। अब, मेरे विचार से यदि मेरे मित्र श्रीमान् जसपाल सिंह कुछ जातियों को लें जिन्हें अब सामान्यतया आदिवासी कहा जाता है और उन जातियों से इनकी तुलना करें जो अनुसूचित जनजाति के शीर्षक के तहत सूचीबद्ध की गई हैं तो वे मुश्किल से ही ऐसी स्थिति पायेंगे जिसमें एक जाति जिसे सामान्यतया आदिवासी की मान्यता प्राप्त है अनुसूची में सम्मिलित नहीं किया गया है। मेरे विचार से यह सम्भव है, कि जहाँ-तहाँ कोई भूल हो गई हो और कोई जाति जो आदिवासी नहीं है शामिल कर ली गई हो। ऐसा भी हो सकता है कि एक जाति जो वास्तव में एक आदिवासी जाति है शामिल न की गई हो, लेकिन यदि ऐसी कोई स्थिति है जहाँ एक जाति जो अब तक आदिवासी समझी जाती रही है, अनुसूचित जनजातियों की सूची में शामिल नहीं की गई हो, इसके लिए हमने, जैसा कि प्रारुप संविधान में देखा जा सकता है, एक प्रावधान जोड़ा है जिसके तहत स्थानीय सरकार को अधिसूचना द्वारा किसी ऐसी विशेष जाति को अनुसूचित जनजातियों की सूची में जोड़ने की अनुमति होगी जो अब तक सूची मे शामिल नहीं की गई है। मेरे विचार से अब मेरे मित्र श्रीमान् जसपाल सिंह को संतुष्ट हो जाना चाहिए।
उन्होंने मुझसे एक दूसरा यह प्रश्न पूछा था कि यह मानते हुए कि किसी अनुसूचित क्षेत्र में रहने वाला किसी अनुसूचित जनजाति का कोई सदस्य या किसी जनजातीय क्षेत्र में रहने वाला किसी अनुसूचित जनजाति का कोई सदस्य यदि भारत के किसी ऐसे अन्य क्षेत्र में स्थानान्तरण कर जाता है जो अनुसूचित क्षेत्र तथा जनजातीय क्षेत्र दोनो के बाहर है, क्या वह उस स्थानीय सरकार जिसके क्षेत्राधिकार में वह रह रहा है, से उन्हीं विशेष रियायतों का अधिकार जता सकता है जिनका वह तब अधिकारी होता जब वह अनुसूचित क्षेत्र या जनजातीय क्षेत्र के अन्दर रह रहा होता? मेरे लिए इस प्रश्न का उत्तर देना कठिन है। यदि यह मामला उन क्षेत्रों में उभरता है जहाँ इस तरह के मामले पर निर्णय टिका है तो हम निश्चित रूप से इस संविधान की किसी धारा के रूप में इस