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( iv ) फ्कि अनुच्छेद 13 की धारा (3), (4), (5) और (6) में, शब्द
फ्पाबंदियोंय् के पहले शब्द फ्उचितय् अन्तर्विष्ट किया जाए।य्
( v ) फ्कि अनुच्छेद 13 की धारा (4) में, शब्दों फ्आम जनताय् के लिए शब्द
फ्सार्वजनिक व्यवस्था या नैतिकताय् प्रतिस्थापित किए जाएं।य्
( vi ) फ्कि अनुच्छेद 13 की धारा (5) में, शब्दों फ्आदिवासीय् के लिए शब्द
फ्अनुसूचितय् प्रतिस्थापित किए जाएं।य्
[ अनुच्छेद 13 को संविधान में जोड़ दिया गया। ]
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अनुच्छेद 14
ख्ऽ, श्री टी.टी. कृष्णाचारी (मद्रास - जनरल) ः श्रीमान् उपाध्यक्ष, महोदय, सदन के समक्ष जो बात मुझे रखनी है वह अपेक्षाकृत संकीर्ण है .............
मैं स्वीकार करता हूँ कि संशोधन प्रस्तावित करने के लिए निश्चय ही मुझे अब देर हो चुकी है। मैं यह चाहता हूँ कि खण्ड में इस प्रकार शब्द विन्यास हो ‘किसी भी व्यक्ति पर उसी अपराध के लिए एक से अधिक बार मुकदमा नहीं चलाया जायेगा और न ही उसे दंडित किया जायेगा।’ यदि मेरे माननीय मित्र डॉ. अम्बेडकर शब्दों ‘न ही उसे दंडित किया जायेगा’ के पहले शब्दों ‘मुकदमा नहीं चलाया जायेगा और’ का जोड़ा जाना स्वीकार कर लेते हैं और यदि, महोदय, आप और यह सदन उन्हें ऐसा करने की अनुमति देंगे तो यह न केवल एक बुद्धिमानी होगी बल्कि भविष्य में सरकारों को बहुत बड़ी कठिनाई से बचा लेगी। इस सुझाव को मैं सदन के समक्ष रखने का साहस करता हूँ। सदन, जिस रूप में उचित समझे इस पर विचार करे।
श्रीमान् उपाध्यक्ष ः क्या सदन श्री टी.टी. कृष्णमाचारी ने जो अनुरोध किया है उसकी अनुमति देता है?
माननीय सदस्य ः हाँ।
श्रीमान् उपाध्यक्ष ः अब, मैं डॉ. अम्बेडकर से श्री टी.टी. कृष्णमाचारी द्वारा सुझाये गये संशोधन को प्रस्तावित करने का अनुरोध करूँगा।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ः श्रीमान् उपाध्यक्ष, महोदय, इस अनुच्छेद के प्रति प्रस्तावित किए गये संशोधनों के संबंध में, मैं कह सकता हूँ कि मैं श्रीमान् टी. टी. कृष्णमाचारी द्वारा प्रस्तावित संशोधन को स्वीकार करने के लिए तैयार हूँ। वास्तव में संशोधन की आवश्यकता नहीं है लेकिन क्योंकि कुछ संदेह व्यक्त किए गये हैं कि शब्दों ‘दण्डित करना’ की विभिन्न प्रकार से व्याख्या की जा सकती है, मेरे विचार से, शब्दों फ्मुकदमा चलाना और दंडित करनाय् को जोड़ना वांछनीय हो सकता है।
ऽ सी.ए.डी., अंक VII, 2 दिसम्बर, 1948, पृ. 795-97