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90 बाबा साहेब डा. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

अनुच्छेद 16

ख्ऽ, माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ः श्रीमान् उपाध्यक्ष, श्रीमान् सुब्रह्मण्यम की बात को जैसा मैं समझ पाया हूँ, यदि मैंने उसे सही समझा है तो उन्हें अनुच्छेद 16 पर आपत्ति नहीं है बल्कि उन्हें आपत्ति अनुच्छेद के स्थान को लेकर है। वह होते हैं जहाँ तक इस अनुच्छेद का संबंध है यद्यपि इसकी उपयोगिता और आवश्यकता हो सकती है तथापि इसे मूलाधिकारों में नहीं रखा जाना चाहिए। और उनकी दूसरी बात, यदि मैं सही समझा हूँ तो वह यह है कि चूँकि इस अनुच्छेद को अनुच्छेद 244 के अधीन कर दिया गया है इसलिए अनुच्छेद 16 पूर्णतया रद ् द हो सकता है और उनके अपने शब्दों में, इसका कुछ भी शेष नहीं बचेगा यदि अनुच्छेद 244 के तहत दी गई शक्तियों का प्रयोग किया जाता है। मैं सोचता हूँ उन्होंने जो कहा उसको सारबद ् ध करके मैंने सही किया है।

अब, मैं इस तर्क की कद्र करता हूँ कि अनुच्छेद 16 मूलाधिकारों की सूची में सही स्थान पर नहीं है और कुछ हद तक मैं श्रीमान् सुब्रह्मण्यम से सहमत हूँ। लेकिन मैं उन्हें स्पष्ट करूँगा कि क्यों इसे मूलाधिकारों में शामिल करने की आवश्यकता हुई? मेरे मित्र श्रीमान् सुब्रह्मण्यम याद करेंगे जब संविधान सभा शुरू हुई थी तब हमने कुछ सीमाओं के तहत शुरूआत की थी। एक सीमा यह थी कि भारतीय राज्य संघ से केवल तीन विषयों के आधार पर जुड़ेंगे - विदेशी मामले, सुरक्षा और संचार। वे किसी अन्य मामले के आधार पर केन्द्रीय संसद को विधि-निर्माण और कार्यकारी न्यायक्षेत्र को आगे बढ़ाने की अनुमति देने पर सहमत नहीं होंगे। इसलिए वे अनुभव करेंगे कि संविधान सभा, और साथ ही प्रारुप समिति भी एक गंभीर सीमा में थी। एक ओर, यह महसूस किया गया कि यदि व्यापार और वाणिज्य सम्पूर्ण भारत में स्वतंत्र नहीं है तो अखिल भारतीय संघ बनाने से कोई लाभ नहीं होगा और न ही इससे कोई उददेश्य पूरा होगा। यह एक आम विचार था। दूसरी ओर, ् यह पाया गया कि जहाँ तक राज्यों की स्थिति का संबंध था, जिसके बारे में मैं पहले ही कह चुका हूँ, वे व्यापार और वाणिज्य को सम्पूर्ण भारत में संसद के वैधानिक प्राधिकारी के अधीन करने की अनुमति देने को तैयार नहीं थे। यदि हमारे लिए व्यापार और वाणिज्य को सूची I में शामिल करना सम्भव होता, जिसका अर्थ है कि संसद को सम्पूर्ण भारत में व्यापार और वाणिज्य के संबंध में कानून बनाने का कार्यकारी अधिकार होगा, तो हमारे लिए व्यापार और वाणिज्य को मूलाधिकारों में अनुच्छेद 16 के तहत लाने की आवश्यकता न होती। लेकिन क्योंकि यह रास्ता बन्द हो चुका था, उन बुनियादी सोच विचारों के आधार पर जो संविधान सभा के आरंभ में क्रियाशील थे सम्पूर्ण भारत में व्यापार और वाणिज्य के मामले में समानता के उददेश्य के लिए, किसी शीर्षक के तहत हमें कोई स्थान खोजना ् पड़ा। काफी मात्रा में प्रवीणता का प्रयोग करने के बाद हमारे अधिसंख्य लोगों की इस इच्छा

ऽ सी.ए.डी., अंक VII, 3 दिसम्बर, 1948, पृ. 802-03