92 बाबा साहेब डा. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
इस संशोधन में एक संशोधन है, यह सूची में नं. 93 श्री रामचन्द्र उपाध्याय के नाम में है।
(श्री कामथ द्वारा व्यवधान)
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[#] माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ः श्रीमान् उपाध्यक्ष, मुझे शुरू में ही कह देना चाहिए कि कौन से संशोधनों को मैं स्वीकार करने के लिए तैयार हूँ और कौन से संशोधनों को मैं स्वीकार नही कर सकता। प्रस्तावित किए गये संशोधनों में से मैं केवल प्रो. के.टी. शाह का संशोधन सं. 559 स्वीकार करने के लिए तैयार हूँ जो अनुच्छेद 17 की धारा (2) में शब्दों ‘भेदभाव इस आधार पर’ के स्थान पर शब्दों ‘भेदभाव केवल इस आधार पर’ को प्रतिस्थापित करता है। शेष संशोधनों को, मैं स्वीकार करने की स्थिति में नही हूँ।
उन संशोधनों के संबंध में, जिन्हें जैसा मैने कहा मैं स्वीकार नहीं कर सकता उनमें से एक प्रो. के.टी. शाह का शब्द ‘देवदासी’ अंतर्विष्ट करने वाला संशोधन है। अब मैं समझता हूँ कि ‘देवदासी’ को शामिल करने के संबंध में उनके तर्कों का उन अन्य सदस्यों द्वारा उत्तर दिया जा चुका है जिन्होंने बहस में भाग लिया है और मैं नहीं सोचता कि उन तर्कों में मेरे द्वारा कुछ जोड़ने से कोई उपयोगी लक्ष्य प्राप्त होगा जिन पर पहले ही बल दिया जा चुका है।
मेरे माननीय मित्र, श्रीमान् एच.बी. कामथ के उस संशोधन के संबंध में, वे शब्द ‘जनता’ के स्थान पर शब्द ‘सामाजिक और राष्ट्रीय’ चाहते हैं। मैंने सोचा होगा कि शब्द ‘जनता’ काफी विस्तृत है जो राष्ट्रीय और सामाजिक दोनों ही शब्दों को शामिल कर लेता है और इसलिए दो शब्दों का प्रयोग करना अनावश्यक है जब एक शब्द के प्रयोग से ही उद ् देश्य पूरा हो सकता है और मेरे विचार से अब यह सहमत होंगे कि यही रुख अपनाना उचित है।
मेरे मित्र दामोदर स्वरूप सेठ के संशोधन के संबंध में मुझे यह संशोधन अनावश्यक प्रतीत होता है और इसलिए मैं इसे स्वीकार नही करता। सरदार भूपिन्दर सिंह मान का संशोधन जिसमें वे चाहते हैं कि जहाँ कहीं भी राज्य द्वारा अनुच्छेद 17 की धारा (2) के प्रावधानों के तहत अनिवार्य श्रम लागू किया गया है वहाँ एक प्रतिबंध रखा जाना चाहिए कि इस प्रकार के श्रम का राज्य द्वारा सदैव दाम चुकाया जायेगा। अब, मैं नहीं सोचता कि राज्य के प्राधिकार पर जो अनिवार्य सेवा मांग रहा है उस पर इस तरह की कोई पाबंदी लगाना वांछनीय है। यह बिल्कुल सम्भव हो सकता है कि राज्य द्वारा मांगी गई अनिवार्य सेवा को ऐसे घंटों तक सीमित किया जाए कि यह उस नागरिक को अपनी जीविकोपार्जन के लिए समय निकाल पाने से वंचित न करे जिस पर यह धारा लागू होती है और यदि उदाहरण के लिए, यह अनिवार्य सेवा अवकाश के घंटों तक सीमित कर दी जाती है जब वह अपनी जीविका कमाने में व्यस्त नहीं है तब राज्य के लिए यह कहना पूर्णतया न्यायसंगत होगा कि वह कोई मुआवजा नहीं देगा।
# सी.ए.डी., अंक VII, 3 दिसम्बर, 1948, पृ. 812-13