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इस धारा में यह देखा जा सकता है कि मुआवजे का भुगतान न करना हमले का आधार नहीं हो सकता, क्योंकि उपधारा (2) में प्रतिवादित मूलभूत सिद्धांत यह है - कि जब कभी भी अनिवार्य श्रम या अनिवार्य सेवा की मांग की जाएगी तो यह सभी से मांगी जाएगी और यदि सभी से सेवायें मांगी जाती हैं और कुछ भी दाम नहीं चुकाता है तो मैं नहीं समझता राज्य कोई भारी अन्याय कर रहा है। महोदय, मैं महसूस करता हूँ कि निश्चित को ऐसे ही अनिश्चित छोड़ दिया जाए जैसी यह अनुच्छेद के वर्तमान रूप में छोड़ दी गई है।
श्री एच.बी. कामथ ः महोदय, क्या मेरे संशोधन पर सूचना के प्रश्न पर डॉ. अम्बेडकर की आपत्ति केवल इस आधार पर है कि यह एक शब्द के स्थान पर दो शब्दों से मिलकर बना है? उस स्थिति में, मैं खुश होऊँगा यदि शब्द रचना ‘जनता’ के स्थान पर या तो ‘सामाजिक’ या ‘राष्ट्रीय’ हो।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ः एक विस्तृत वाक्य-रचना जिसमें ये दोनों शामिल हैं, का प्रयोग करना बेहतर है।
श्री रोहिणी कुमार चौधरी (असम -जनरल) ः महोदय क्या मैं जान सकता हूँ कि क्या माननीय सदस्य संशोधन सं. 548 को स्वीकार करते हैं जो वेश्यावृति से संबंधित है, और जो ज्ञानी गुरुमुख सिंह मुसाफिर द्वारा प्रस्तावित किया गया है?
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ः मैं समझता हूँ कि यह प्रस्तावित नहीं किया गया।
श्रीमान् उपाध्यक्ष ः यह प्रस्तावित नहीं किया गया।
मैं अब संशोधनों को एक-एक करके मतदान के लिए रखूँगा।
श्रीमान् काज़ी सईद करीमुद ् दीन का संशोधन 544 अस्वीकृत हुआ।
श्रीमान् दामोदर स्वरूप सेठ का संशोधन सं. 545 अस्वीकृत हुआ।
प्रो. के.टी. शाह का संशोधन सं. 546 अस्वीकृत हुआ।
सरदार भूपिन्दर सिंह मान का संशोधन सं. 560 वापस ले लिया गया।
¹श्रीमान् कामथ का संशोधन सं. 556 अस्वीकत हुआ।ह्
संशोधन सं. 559 जो प्रो. के.टी. शाह के नाम में है, डॉ. अम्बेडकर द्वारा स्वीकार कर लिया गया और यह स्वीकृत हुआ।
फ्कि अनुच्छेद 17 की धारा (2) में, शब्दों ‘भेदभाव इस आधार पर’ के लिए शब्दों ‘भेदभाव केवल इस आधार पर’ को प्रतिस्थापित किया जाए।य्
अनुच्छेद 17 यथासंशोधित स्वीकृत हुआ और संविधान में जोड़ दिया गया।