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अनुच्छेद 22
ख्ऽ, श्रीमान् उपाध्यक्ष ः डॉ. अम्बेडकर के नाम में, संशोधन सं. 645।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर - महोदय, मैं प्रस्ताव करता हूँ -
फ्कि अनुच्छेद 22 की धारा (1) में, शब्द फ्राज्य के द्वाराय् निकाल दिये जाएं।य्
इस संशोधन का उद ् देश्य उस संदेह की सम्भावना को दूर करना है जो उत्पन्न हो सकता है। यदि शब्द फ्राज्य के द्वाराय् प्रारुप में बने रहते हैं जैसे कि ये अभी हैं तो उनका यह अर्थ लगाया जा सकता है कि यह अनुच्छेद राज्य के अलावा अन्य संस्थानों को धार्मिक शिक्षण देने की अनुमति देता है। इस अनुच्छेद के मूल में जो सिद्धांत है वह यह है कि कोई भी संस्थान जो पूर्णतया या अंशतः राज्य कोष द्वारा सम्पोषित है धार्मिक शिक्षण के उद ् देश्य के लिए प्रयोग नहीं किया जायेगा। इस बात को महत्व दिये बिना कि धार्मिक शिक्षण राज्य द्वारा दिया जा रहा है या किसी अन्य निकाय द्वारा।
ऽ ऽ ऽ ऽ
[#] श्रीमान् उपाध्यक्ष ः हालाँकि मैं अन्य सदस्यों को भी अवसर देना पसंद करूंगा, जिनकी राय का मैं सम्मान करता हूँ लेकिन मैं पाता हूँ कि कई वक्ता पहले ही अपनी राय व्यक्त कर चुके हैं। 12 संशोधन मतदान के लिए रखे जाने हैं। नौ संशोधन पहले ही प्रस्तावित किए जा चुके हैं और मेरे विचार से छह वक्ता पहले ही बोल चुके हैं। मैं महसूस करता हूँ कि इस अनुच्छेद पर पर्याप्त चर्चा हो चुकी है। अब मैं डॉ. अम्बेडकर से बोलने का अनुरोध करता हूँ।
पंडित लक्ष्मीकांत मैत्रा (प. बंगाल - जनरल) ः महोदय, मैं चाहता हूँ कि एक या दो बातों को स्पष्ट किया जाए। मैं भाषण देने नहीं जा रहा हूँ। मैं केवल चाहता हूँ कि एक या दो बातों को स्पष्ट कर दिया जाए।
श्रीमान् उपाध्यक्ष ः मैं अपना फैसला पहले ही सुना चुका हूँ। मैं और भाषणों की अनुमति नहीं दे सकता, विशेषकर क्योंंकि आप और मैं एक ही प्रांत से हैं।
पंडित लक्ष्मीकांत मैत्रा - एक ही प्रांत का होने से यहाँ कोई संबंध नही है। मैं केवल एक बात के बारे में स्पष्टीकरण चाहता हूँ।
श्रीमान् उपाध्यक्ष ः मेरा निर्णय अन्तिम है, पंडित जी। डॉ. अम्बेडकर।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ः श्रीमान् उपाध्यक्ष, महोदय, प्रस्तावित किए गये संशोधनों में से केवल श्रीमान् कपूर द्वारा प्रस्तावित संशोधन सं. 661 को स्वीकार कर सकता हूँ जो अनुच्छेद में से उपधारा (3) को निकालता है और मुझे खेद है कि मैं अन्य संशोधनों को स्वीकार नहीं कर सकता।
ऽ वही, पृष्ठ 871
# सी.ए.डी., अंक VII, 7 दिसम्बर, 1948 पृ. 882-86