अनुच्छेद 22 - Page 116

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विद्यालय है। स्पष्टतया, ऐसे विद्यालय में हिन्दू धर्म में विश्वास रखने वाले हिन्दुओं के बच्चे होंगे, इसमें ईसाई समुदाय, यहूदी समुदाय या जरतुश्ती समुदाय से संबंधित शिष्य भी होंगे। यदि कोई और आगे जाये, और मेरे विचार से, हमें इससे आगे जाना चाहिए, तो हिन्दू फिर विभिन्न किस्मों मे बँटे मिलेंगे_ वहाँ सनातनी हिन्दू होंगे, वैदिक धर्म में विश्वास रखने वाले वैदिक हिन्दू होंगे, वहाँ बौद्ध होंगे, वहाँ जैन होंगे, - हिन्दुओं में भी शैव होंगे, वैष्णव होंगे। क्या शैक्षणिक संस्थानों से सभी बच्चों के साथ समान व्यवहार करने की और सभी समुदायों में धार्मिक शिक्षण उपलब्ध कराने की अपेक्षा की जानी चाहिए? मुझे यह लगता है कि राज्य को यह काम सौंपना उससे असम्भव को करने के लिए कहने जैसा होगा।

तीसरी बात जिसका मैं इस संबंध में उल्लेख करना चाहूँगा वह है कि दुर्भाग्य से जो धर्म इस देश में प्रचलित हैं वे मात्र असामाजिक ही नहीं हैं_ जहाँ तक उनके परस्पर संबंधों की बात है वे समाज-विरोधी भी है_ प्रत्येक धर्म यह दावा करता है कि केवल उसकी शिक्षायें ही मुक्ति का सही रास्ता है, और अन्य सभी धर्म गलत हैं। मुसलमान विश्वास करते हैं कि कोई भी व्यक्ति जो इस्लाम के सिद्धांत में विश्वास नहीं रखता वह काफिर है जिसे मुसलमानों से भ्रातृतुल्य व्यवहार का हक नहीं है। ईसाइयों का भी ऐसा ही विश्वास है। इस दृष्टिकोण से मुझे यह लगता है कि हम एक संस्थान के शांतिपूर्ण वातावरण में बहुत अधिक हलचल पैदा कर देंगे यदि किसी विशेष धर्म के सच्च चरित्र और किसी अन्य धर्म के गलत चरित्र के जैसे विवाद विद्यालय में ही साथ-साथ ला देते हैं। इसलिए मैं कहता हूँ कि अनुच्छेद 22(1) को निर्धारित करने के साथ कि राज्य के संस्थानों में धार्मिक शिक्षण नहीं दिया जाएगा, मेरे विचार से हमने एक पूर्णतया सुरक्षित रास्ता तय कर लिया है।

अब, दूसरी धारा के संबंध में, मेरे विचार से इसे पर्याप्त रूप से नहीं समझा गया है। हमने एक ऐसे समुदाय के इस दावे के साथ सामंजस्य स्थापित करने की कोशिश की है जिसने अपने स्वयं के बच्चों की शिक्षा या सांस्कृतिक मामलों में उन्नति के लिए शैक्षणिक संस्थानों को शुरू किया है कि वह इस सच्चाई में धार्मिक शिक्षण देने की अनुमति देता है। राज्य, निस्संदेह, सहायता देने, न देने के लिए स्वतंत्र है_ मात्र एक पाबंदी जो हमने रखी है वह है, कि राज्य ऐसे संस्थानों को सहायता के हक से मात्र इस आधार पर वंचित नहीं कर सकता कि वे एक समुदाय द्वारा सम्पोषित हैं, न कि एक सार्वजनिक निकाय द्वारा। हमने आगे भी एक योग्यता का प्रावधान किया है, कि जबकि संस्थान में धार्मिक शिक्षण दिये जाने की स्वतंत्रता है और राज्य द्वारा दिया गया अनुदान इस प्रकार के शिक्षण दिये जाने पर प्रतिबंध नहीं होगा, तब भी यह अन्य सुमदायों के बच्चों को यह शिक्षण नहीं देगा और न ही यह उनके लिए अनिवार्य करेगा जब तक कि ये संस्थान उन बच्चों के अभिभावकों की स्वीकृति प्राप्त नहीं कर लेते। यह, मेरे विचार से, एक हितकारी प्रावधान है यह दो कार्य करता है ...........

श्री एच.बी. कामथ ः स्पष्टीकरण की बात पर, किसी एक समुदाय या एक अल्पसंख्यक समुदाय द्वारा अपने स्वयं के शिष्यों के लिए चलाये जाने वाले विद्यालय