102 बाबा साहेब डा. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
के बारे में - ऐसा विद्यालय नहीं जहाँ सभी समुदाय मिले-जुले हैं, बल्कि ऐसे विद्यालय के बारे में जो उस समुदाय द्वारा अपने स्वयं के शिष्यों के लिए चलाया जाता है?
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ः यदि मेरे मित्र श्रीमान् कामथ दूसरा अनुच्छेद पढ़ेंगे तो वह देखेंगे कि जब एक बार एक संस्थान को चाहे वह समुदाय द्वारा सम्पोषित है या नहीं, अनुदान मिलता है तो उसकी शर्त यह है कि वह विद्यालय को सभी समुदायों के लिए खुला रखेगा। वह प्रावधान उन्होंने नहीं पढ़ा है।
इसलिए उपधारा (2) के द्वारा हम वास्तव में दो उद ् देश्यों को प्राप्त कर रहे हैं। एक यह कि हम उस एक समुदाय को विद्यालय में इस प्रकार का शिक्षण देने की अनुमति दे रहे हैं जिसने अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन की तरक्की के लिए अपने संस्थान स्थापित किए हैं। हमने इसकी भी व्यवस्था की है कि अन्य समुदायों के बच्चे जो उस विद्यालय में आते हैं, उनको इस प्रकार के शिक्षणों को ग्रहण करने के लिए मजबूर नहीं किया जायेगा जब तक कि अभिभावक इसकी स्वीकृति नहीं देते क्योंकि ये शिक्षण निस्संदेह और स्पष्टतया उस विशेष समुदाय के धर्म के बारे में होंगे। जैसा कि मैं कहता हूँ, हमने यह दोहरा उद ् देश्य पा लिया है और जो धार्मिक शिक्षण देना चाहते हैं वे अपने संस्थान स्थापित करने तथा राज्य से सहायता मांगने के लिए और धार्मिक शिक्षण देने के लिए स्वतंत्र हैं, लेकिन वे इस धार्मिक शिक्षण को अन्य समुदायों पर थोपने की स्थिति में नहीं होंगे। इसलिए यह कहना उचित नहीं होगा कि इस अनुच्छेद के माध्यम से हमने धार्मिक शिक्षण पर पूर्णतया रोक लगा दी है। प्रत्येक समुदाय को कुछ शर्तों के अधीन अपने उद ् देश्यों के अनुसार धार्मिक शिक्षण के पठन-पाठन की स्वतंत्रता दी गई है। पाबंदी इस बात पर है, कि राज्य पूर्णतया सार्वजनिक कोष द्वारा सम्पोषित संस्थानों में धार्मिक शिक्षण देने के लिए स्वतंत्र नहीं होगा।
पंडित लक्ष्मीकांत मैत्रा ः क्या मैं माननीय सदस्य से एक प्रश्न पूछ सकता हूँ? उदाहरण के लिए, संस्कृत महाविद्यालय कलकत्ता की तरह का एक शैक्षणिक संस्थान है जिसका प्रबंध पूर्णतया सरकारा द्वारा किया जाता है। वहाँ वेद, स्मृति, गीता, और उपनिषद ् पढ़ाये जाते हैं। इसी तरह बंगाल के कई भागों में संस्कृत संस्थान हैं जहाँ इन विषयों पर शिक्षा दी जाती है। आप अनुच्छेद 22(1) में व्यवस्था करते हैं कि उस संस्थान द्वारा कोई धार्मिक शिक्षण नहीं दिया जा सकता जो पूर्णतया राज्य के कोष से संचालित हैं। ये पूर्णतया राज्य कोष द्वारा सम्पोषित है। मेरा प्रश्न है, क्या इसकी इस तरह व्याख्या की जायेगी कि वेदों, या स्मृतियों, या शास्त्रों, या उपनिषदों का शिक्षण धार्मिक शिक्षण के तहत आता है? उस स्थिति में इन सभी संस्थानों को बंद करना पड़ेगा।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ः मेरे मित्र श्रीमान् मैत्रा ने जिन संस्थानों का जिक्र किया है उनके चरित्र के बारे में मुझे उचित जानकारी नहीं है और इसलिए यह मेरे लिए काफी कठिन है।