अनुच्छेद 22 - Page 118

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पंडित लक्ष्मीकांत मैत्रा ः उदाहरण के लिए, सरकारी संस्कृत महाविद्यालयों और विद्यालयों में गीता, उपनिषद, वेद तथा इसी तरह के विषयों की शिक्षा को लें।

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ः मेरा अपना विचार यह है कि धार्मिक शिक्षण को अनुसंधान या अध्ययन से भिन्न किया जाए। ये बहुत भिन्न बातें हैं। धार्मिक शिक्षण का अर्थ यह है। उदाहरण के लिए, जहाँ इस्लाम धर्म का संबंध है, इसका अर्थ है कि आप एक ईश्वर में विश्वास रखते हैं, कि आप विश्वास करते हैं कि पैगम्बर संत ही आखिरी संत हैं और आगे इसी प्रकार, दूसरे शब्दों में जिसे हम धर्म सिद्धांत कहते हैं। एक धर्म, सिद्धांत अध्ययन से बिल्कुल भिन्न है।

श्रीमान् उपाध्यक्ष ः क्या मैं एक मिनट के लिए बीच में बोल सकता हूँ। कलकत्ता विश्वविद्यालय के महाविद्यालयों में निरीक्षक के रूप में, मैं संस्कृत महाविद्यालय में निरीक्षण किया करता था, जहाँ जैसा कि पंडित मैत्रा को ज्ञात होगा, विद्यार्थियों को केवल विश्वविद्यालय के पाठ ् यक्रम की पुस्तकें ही नहीं पढ़नी पड़ती हैं बल्कि इसके बाहर संस्कृत साहित्य की पुस्तकें, वास्तव में संस्कृत की पवित्र पुस्तकें, भी पढ़नी पड़ती हैं, लेकिन इसे कभी धार्मिक शिक्षण नहीं माना गया_ इसे संस्कृति के एक पाठयक्रम की तरह ही माना गया।

पंडित लक्ष्मीकांत मैत्रा ः मेरा प्रश्न यह है। यह अनुसंधान की बात नहीं है। यह मात्र धर्म या धार्मिक शाखाओं के शिक्षण की है।

मैं पूछता हूँ कि गीता और उपनिषदों पर भाषण देने को धार्मिक शिक्षण देना माना जाएगा? उपनिषदों का प्रतिपादन अनुसंधान का मामला नहीं है।

श्रीमान् उपाध्यक्ष ः यह विद्यार्थियों को शिक्षा देने का प्रश्न है और मैं कम से कम एक उदाहरण ऐसा दे सकता हूँ जहाँ संस्कृत महाविद्यालय में एक मुसलमान विद्यार्थी था।

श्री एच.बी. कामथ ः स्पष्टीकरण के प्रश्न पर, क्या मेरे मित्र डॉ. अम्बेडकर कहना चाहते हैं कि उन विद्यालयों में जो एक समुदाय द्वारा विशेषकर केवल अपने समुदाय के शिष्यों के लिए चलाये जा रहे हैं उनमें धार्मिक शिक्षण अनिवार्य नहीं होना चाहिए।

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ः यह उन पर छोड़ दिया गया है। यह उसी समुदाय पर इसे अनिवार्य करने या न करने के लिए छोड़ दिया गया है। हमने जो किया है वह यह निर्धारित किया है कि उस समुदाय को उन समुदायों के बच्चों के लिए इसे अनिवार्य करने का अधिकार नहीं होगा जो उस समुदाय से संबंधित नहीं है जो विद्यालय चला रहा है।

प्रो. शिब्बनलाल सक्सेना ः जिस तरीके से आपने शब्द ‘धार्मिक शिक्षण’ को समझाया है उसे संविधान में स्थान मिलना चाहिए।

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ः मेरे विचार से अदालतें ही इस मामले को तय करेंगी, जब यह मामला उनके समक्ष जाएगा।