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अनुच्छेद 22-अ (नया अनुच्छेद)

ख्ऽ, प्रो. के.टी. शाह ः महोदय, मैं प्रस्ताव करने की प्रार्थना करता हूँ -

फ्कि अनुच्छेद 22 के बाद, अधोलिखित नया अनुच्छेद अन्तर्विष्ट किया जाए-

‘22 अ। धार्मिक संगठनों के प्रमुखों के सभी विशेषाधिकार, निरापदतायें या विमुक्तियां समाप्त कर दी जाएंगी।य्

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[♣] माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ः श्रीमान् उपाध्यक्ष, महोदय, यह संशोधन अपने उददेश्य के लिए काफी प्रशंसनीय है लेकिन मैं नहीं जानता कि क्या यह संशोधन कतई ् आवश्यक है। प्रथम तो, ये सभी उपाधियों जो धार्मिक पदाधिकारियों के पास होती हैं भविष्य में राज्य द्वारा प्रदान नहीं की जा सकती क्योंकि हमने मूलाधिकारों में पहले ही शामिल कर लिया है कि कोई भी उपाधि प्रदान नहीं की जाएगी और स्पष्टतया इस प्रकार की कोई भी उपाधि, राज्य द्वारा प्रदान नहीं की जा सकती। दूसरे, जैसा कि शायद मेरे माननीय मित्र जानते हैं, किसी निश्चित उपाधि जिसे एक व्यक्ति स्वयं के लिए चुनता है को लागू करने के लिए कोई याचना स्वीकार्य नहीं हो सकती। यदि कोई व्यक्ति स्वयं को शंकराचार्य कहता है तो याचना का कोई अधिकार स्वीकार्य नहीं हो सकता। नागरिक प्रक्रिया संहिता के भाग 9 में यह पूर्णतया स्पष्ट कर दिया गया है कि जिसे आप प्रतिष्ठा कह सकते हैं आज उसको लागू करने के लिए कोई याचना स्वीकार्य नहीं हो सकती। यदि प्रतिष्ठा के साथ किसी प्रकार की सम्पत्ति या कुछ परिलाभ जुड़े हैं तो वह एक अलग किस्म का मामला है, लेकिन मात्र प्रतिष्ठा इस कार्यवाही का आधार कतई नहीं हो सकती।

सुख-सुविधाओं के बारे में जिनका शायद उनमें से कुछ लोग उपभोग करते हैं, यह निश्चित रूप से कार्यपालिका और विधायिका की शक्ति के अंतर्गत है कि ये उन्हें वापस ले सकती हैं। यह बिल्कुल सच है, जैसा कि मेरे माननीय मित्र श्रीमान् चौधरी ने कहा कि कुछ मामलों में मजिस्ट्रेट द्वारा सम्मन भेजे जाते हैं। दूसरे मामले में जब संबंधित व्यक्ति जीवन में बड़े पद पर पहुँच जाता है, तो सम्मन भेजने के बजाय वह उसे पत्र भेजता है। कुछ व्यक्ति, जब अदालतों में उपस्थित होते हैं तो उन्हें खड़ा रखा जाता है और कुछ को कुर्सियां पेश की जाती हैं। ये सभी मामले प्रतिष्ठा के हैं जो पूर्णतया सरकार और विधायिका के क्षेत्र में हैं। यदि किसी नागरिक के प्रति कोई अनियमितता, भेदभाव या असमानता बरती जाती है तो इन अनियमितताओं को दूर करने के लिए विधायिका और कार्यपालिका निश्चय ही स्वतंत्र हैं। इसलिए मैं समझता हूँ कि इस संशोधन की बिल्कुल भी आवश्यकता नहीं है।

¹प्रो. शाह का प्रस्ताव अस्वीकृत हुआ।ह्

ऽ ♣ सी.ए.डी., अंक सी.ए.डी., अंक VIIVII, 7 दिसम्बर, 1948, पृ. 888, 7 दिसम्बर, 1948, पृ. 891